Thursday, December 24, 2009

हर क्षण मुझे नयापन देता है


भागने को विस्थापित नहीं करती कविता
भागने के लिए नहीं
सामना करने के लिए है
शब्दों के बीच बसने वाली
ये अनमोल सखी

कविता से मिलने
हर दिन सुबह
बैठ कर
शब्द दर्पण के सम्मुख
देखता हूँ
अस्पष्ट सा अपना चेहरा
धीरे धीरे फोकस करते हुए
जिस क्षण
साफ़ देख पाता हूँ
स्वयं को
उस क्षण प्रकट होती है कविता

कविता मुझसे नहीं बनती
कविता तो है
निरंतर है

इस निरंतर रचनात्मक नदी में
लगा कर एक डुबकी
तारो ताज़ा होकर
नए दिन के लिए
नए नए उपहार लेकर
तत्पर हूँ
करने स्वागत
हर नए क्षण का

हर क्षण मुझे नयापन देता है
मैं हर क्षण को नयापन देता हूँ

नयेपन से नयेपन तक की
इस रसमय यात्रा को
प्राण देती है कविता


अशोक व्यास
न्यू यार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २९ मिनट
दिसंबर २४, ०९

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