Friday, December 25, 2009

विवशता से उसे पुकारने का खेल


लो फिर
नए सिरे से
शुद्ध खालीपन
कृतज्ञता से भरा हुआ
उल्लास कि महीन चादर बिछी हुई

मुझमें जाग गया
एक अनवरत संगीत
जिसमें
सुनता है
अनंत का मौन

मौन कि आभा में
अंगड़ाई लेती है
वो सम्भावना
जिसमें
झरता हुआ प्यार
अपनी शांति प्रदायक श्वास लिए
फ़ैल जाने चाहता है
धरती के इस छोर से
उस छोर तक


अभी किसी ने
पहनी समर्पण कि पायल
अपार शक्ति स्त्रोत सम्मुख
करने लगा
कोई अपना परिपक्व नृत्य

इस बार
ताल थाप चक्कर घेरे चढाव उतार
इन सब में
प्रकट है
कुछ ऐसा आकर्षण
कि 'व्योम वद व्याप्त' देह वाला वह दर्शक
नहीं रह सकेगा
देर तक
दूर नर्तक से

और मैं जो ये समझता रहा हूँ
कि यह नर्तक मैं हूँ
क्यूं अचानक
भ्रमित हूँ
यह सोच कर कि
नृत्य करने वाला वह था
देखने वाला मैं

बस तसल्ली है इस बात की
कि चाहे
उसने मुझे रिझाया
चाहे मैंने उसे रिझाया

अंत में
हमारा दोपना मिट पाया


एक होने कि अनुभूति अच्छी है
पर एक होकर रहना

नित्य निरंतर आनंद में मग्न
ना अभिव्यक्ति की इच्छा
ना किसी को लुभाने
रिझाने
खिजाने
मनाने
का खेल

लो जाग्रत हुई
नयी चाह की अंगड़ाई

कभी कभी
तोड़ने एकरसता एकत्व के आनंद की
खेला करूंगा खेल
दो होने का

अब प्रश्न ये
की अगर दोपने के खेल में
एकत्व की अनुभूति विस्मृत हुई
तो अपने घर कैसे पहुँच पाउँगा?


उस समय
खुला रह गया था यह प्रश्न
अब
अलग अलग रूप की
अनुभूतियों में डूबा
बार बार
ढूंढता हूँ
वहां तक लौटने का रास्ता
चलता हूँ
रुकता हूँ
चलता हूँ
विश्वास में भरता
कभी संशय में डूबता उतरता

कभी कभी थक कर
भूल भी जाता हूँ
की मैं एकत्व के आनंद की सतत अनुभूति
अपने भीतर संजोये हूँ

आश्चर्य ये
की मुझे अब तक
अच्छा लगता है
ये विवशता से उसे पुकारने का खेल
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अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
दिसंबर २५ ०९ शुक्रवार

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