Saturday, December 19, 2009

विराट की आरती



लिख कर मिटाने से पहले
बार बार ये सोचते रहें यदि कि
दर्द होगा शब्दों को
कराहेगी शब्द व्यक्त करने वाली शक्ति
तो शायद लिखा हुआ गलत सलत भी
मिटा ना पायें
कभी
मिटते समय बोध में छाये रहते हैं
आने वाले नए शब्द
नयापन अपने साथ लाता है
एक तरह का उजाला
एक तरह कि आशा
फूटता है ये विश्वास
कि अब पहले से बेहतर
पहले से अधिक स्पष्ट
और सार युक्त होगी अभिव्यक्ति

शब्द मिटाते हुए हम
मिटने वाले शब्दों के बारे में नहीं
आने वाले शब्दों के बारे में सोच रहे होते हैं जैसे
क्या ऐसा ही है जीवन मृत्य का खेल
जीवन हमेशा जीत जाता है
हालांकि कभी कभी लगता ये है
कि छा गयी है मृत्यु
पर हर अंधियारे के पीछे
आतुर होता है
प्रकट होने के लिए उजाला

हे सृष्टा!
हमें वो आंख देना
कि हम
आने वाले जीवन की ओर देख सकें
और मिटा रही हो जब मृत्यु
तब भी ख्याल मिटने का नहीं
फिर प्रकट होने का बना रहा साँसों से भी परे उस सूक्ष्म में
जहाँ संभव होती है
विराट की आरती


अशोक व्यास
शनिवार, दिसंबर १९, ०९
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४ मिनट

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...