Thursday, September 30, 2010

घर की सी अनुभूति

 
तो फिर
यूँ हुआ
धीरे धीरे 
फिसलने और चलने का अंतर
पोंछ दिया किसी ने
ब्लैक बोर्ड से,

सारे छात्र
 जीवन का जो अर्थ लेकर
आये
आसमान के नीचे
उसमें
बदल गया था 
मूल्यों का अर्थ


तो फिर
धीरे धीरे 
यूँ हुआ कि
सूरज की किरणों के श्रृंगार वाले संस्कार
सजे रह गए 
पारदर्शी शीशे की अलमारियों में

धूप का चश्मा लगा कर
अँधेरे कमरों की
थिरकती रोशनी में
नृत्य करने निकल पड़े सब 
 
तो फिर 
धीरे धीरे
यूँ हुआ है कि 
सन्दर्भों के लहराते आईने में
हिलते-डुलते 
सही-गलत के बोध को लेकर
हम
अब भी शाश्वत का संगीत लेकर
सूचना और तकनीक की आंधी में
 ढूंढ रहे हैं
अपने जैसे लोगों को
 
इस मेले में
साझी सोच वाले समूह के साथ
यह जो एक 
घर की सी अनुभूति है

इसके विस्तार में
क्या विस्तृत होते जाते हैं अनायास ही
हम भी


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, ३० सितम्बर २०१०







Wednesday, September 29, 2010

आत्मीय-स्पर्श

 
अब जीने के साथ साथ
जरूरी है
जताना भी
कि तुम जिंदा हो

अपने होने का अहसास 
औरों तक
पहुँचाने की कला
मार्केटिंग कहलाती है
वो समझदार लोग भी 
मूर्ख मान लिए जाते हैं
जिन्हें ये कला
अब तक नहीं आती है

आत्मीय-स्पर्श, संवेदनशील लोगों को ही
छू पाता है
अधिकतर लोगों का काम ऊपरी चमक से
चल जाता है
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सितम्बर २९, 2010




Tuesday, September 28, 2010

मेला तुम्हारा तुमसे ही है

 
बात उठाओ
ऐसी
जो
तुम्हे उठाये

उठ कर चलना किसी तरंग में
चढ़ कर बहना किसी लहर के साथ
तोड़ देता है खुमार
थाम कर समय की नई पतवार
आ सकते हो 
जड़ता के पार

कर सकते हो
हर सपना साकार
पर पहले
वो
बात उठाओ
कि तुम अपने सपने के साथ
एक मेक हो जाओ

उसे गुनगुनाओ
उसमें रम जाओ

अपने ह्रदय में
अपने लिए
विजय पताका फहराओ
यूँ ही ना 
रह जाओ

मेला तुम्हारा
तुमसे ही है
इस बात को ना
बिसराओ
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ सितम्बर २०१०

 
 

Sunday, September 26, 2010

स्मृति की मधुशाला





उनींदी आँखों में
जाग धर कर
छुप जाने वाला,
कैसे लगा देता है
नींद पर ताला,

रात की चुप्पी में
सुने है क्या-क्या 
मन ये भोला भाला,
मुस्कुराती है
घूंघट हटा कर
स्मृति की मधुशाला,


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ सितम्बर 2010

बदलाव की आशा


नहीं चलेगा
बैठे बैठे
किसी बदलाव की आशा करने का शगल
पसीना बहाओ 
अगर
चाहते हो समस्याओं का हल


खाना-पूर्ति 
ले आये भले
नदी के पार,
कभी नहीं
जानोगे
क्या है रफ़्तार?

गति का स्वाद चखने
चप्पू को तेज़-तेज़ चलाओ
अपने भीतर श्रद्धा नदी को
तन्मय होकर जगाओ



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
27 सितम्बर २०१०, रविवार 



Saturday, September 25, 2010

सृजनात्मकता का मूल स्वर



 
कुछ भी लिखने से पहले
सलेट को पोंछते थे

चाक और सलेट के
घर्षण से उत्पन्न
खुरदुरेपन के स्वर में भी
एक रचनात्मक माधुर्य था 

 एक दूसरे की
चेतना पर
कुछ नई इबारत लिखने का
प्रयास करते हम
 आज भी
रच तो सकते हैं कुछ सुन्दर, 
कुछ नया सा रूप सम्बन्ध का
 
ये खुरदुरापन 
'मित्र' शब्द तक भी
ले जा सकता है
पर
'आत्मीयता' नहीं
'हिंसा' और 'वैर' ही
उभर रहे हैं
इस साझी सामाजिक चेतना की
सलेट पर

क्यूं हम
पूर्वाग्रहों की कटुता
पोंछ नहीं पाते?
शंका और भय की छाया में
जो लिखते हैं
उसमें
सृजनात्मकता का मूल स्वर
निखर ही नहीं पाता


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ सितम्बर 2010

Friday, September 24, 2010

आशा का स्वादिष्ट मुरब्बा





 
लौट कर कहाँ चली जाती हैं
वो सब 
अच्छी-अच्छी  बातें
जिनमें प्यार छलकता है
जिनसे मिलती है
सबको स्वीकारने की दृष्टि,
जिनमें होती है
आश्वस्ति कि
हर बात से
कुछ अच्छा अर्थ निकाल सकते हैं हम

वो बातें
जो आशा का स्वादिष्ट मुरब्बा खिलाती हैं
हमारी चेतना को
और
हम वैसी ही उमंगों से
भर जाते हैं
जैसी महसूस की थीं
कभी बचपन की दीवाली में

वो बातें
शायद हैं तो हमारे आस-पास ही
पर वो मनुष्य
जिनकी साँसों से
सच का प्रवेश हो पाता है
इन बातों में

हैं नहीं शायद आस-पास 
और अब
इस बात पर कौन दिलाये विश्वास 
कि उन्होंने तो ये कहा था
एक दिन
'वो मनुष्य'
जिसकी साँसे इन सब बातों को
सच बनाती हैं
मिलेगा हमें
हमारे ही भीतर


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ सितम्बर २०१०

Thursday, September 23, 2010

सवालों के पुष्प

 
सवाल एक तो ये है
कि
जो है, जैसा है
वह ऐसा ही बना रह पाये
और ये भी
कि जो है
उससे बेहतर हो सब कुछ


सवाल ये है कि
आज
नई किरण
प्रसन्नता कि
कैसे पहुँचाऊँ तुम तक
और ये भी
कि मुझ तक 
आने वाली हर रश्मि में
संतोष की चमक कैसे देख पाये
मेरी संवेदना
 
३ 
सवाल ये है कि
अमूर्त की मूर्ति बना कर
उसे कण कण में जाग्रत करने का अनुष्ठान
जो चलता है
मेरी साँसों में निरंतर
इसकी पावनता 
बनी रही कैसे

सुबह सुबह 
सवालों के पुष्प बना कर
द्वारकानाथ की देहरी पर रख
कृतकृत्य हुआ 
मैं
छोड़ कर अपने को 
बन रहा प्रवाह
शुद्ध आभा का
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ सितम्बर २०१०



Wednesday, September 22, 2010

अमिट आश्वस्ति

 
शुद्ध भाव के बिना
कैसे मिले
शुद्ध प्रसन्नता

शुद्ध प्रसन्नता के बिना
कैसे जगमगाए
सतत आनंद

सतत आनंद के बिना
कैसे स्थिर हो
अमिट आश्वस्ति

अमिट आश्वस्ति
अर्जित करने और सहेजने
क्या करूँ
कैसे करूँ

प्रश्न लेकर
पहुंचता हूँ जब 
परम पिता के द्वार पर
मांगता है
वो
मुझसे शुद्ध भाव


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ सितम्बर २०१०

Tuesday, September 21, 2010

कविता के इस छोर पर से





उस दिन
फिर एक बार
छिड़ गयी बहस
मैंने किया था प्रस्ताव
अब दे रहा हूँ 'त्याग पत्र'
हो चुकी कविता
बस
और नहीं अब
 
उस दिन
ना जाने क्यूं
फिर सोचा मैंने
बंधन है 
कविता के इस छोर पर से
इसे उगते हुए देखना
और
साथ में थी
छटपटाहट
कविता नहीं
जीवन चाहिए
संवेदना का दर्पण चाहिए


सहसा
ना जाने कहाँ से
चला आया था
'सत्य का प्रश्न'
सत्य के साथ
स्वयं को अपनाने की चुनौती
और
तब कहीं कुछ पिघला
किसी किरण ने बताया
'छल को जीने
और
किसी एक फ्रेम में
बंध जाने की चाहत लेकर
कविता के अहाते तक
नहीं पहुंचा जा सकता'


कविता के लिए
निरावरण होना होता है
और
भय स्वयं को 
पूरी तरह अनावृत करने का
कविता की सतह को
छूकर
लौट जाने को उकसाता है
 
कविता पूर्णता की तलाश है
जो अनवरत है
ना जीवन से 'त्याग पत्र' दिया जा सकता है
ना 'कविता' से
क्योंकि
कविता को नकारना 
अपने आप को नकारना है
 
तो क्या मैं ही कविता हूँ
जिसे 
लिख रहा है कोई
मुझमें बैठ कर
हर दिन
हर पल
 
तो क्या
अनंत की लिखाई
पढने, समझने और गुनगुनाने का नाम ही
कविता है?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ सितम्बर २०१०

Monday, September 20, 2010

आस-पास


चेहरा पोत कर
खाली रंगमंच में
अकेले
बीती हुई कामनाओं का
अभिनय करते हुए
गहराता है अहसास
कि
जो कुछ पुराना था
वो अब 
नया होकर
बना हुआ है आस-पास
 
 
हम जिस जिस तरह से
संदर्भो को अपनाते हैं
उसी के अनुसार
नए, पुराने
और पुराने, नए हो जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० सितम्बर २०१०

Sunday, September 19, 2010

सारयुक्त होने की प्यास

सब कुछ
गहरे सन्नाटे में,

एक अदृश्य हाथ
अचानक
तोड़ देता है
आन्तरिक माधुर्य सृजित करता
सूक्ष्म तंतु,

चुप्पी में
उदासीनता का भंवर
जकड कर मुझे
आतुर है
लीलने उत्साह मेरा,
समर्थन और
प्रोत्साहन की प्यास,

आस-पास के
वातावरण में
नहीं पाती जब
प्राप्य अपना

ठहर का
थपथपाता हूँ
आत्म-वैभव का
समुन्दर,
जगा कर
अनाम क्षेत्र से
नयी लहर
उमंग की,
उज्जीवित होता
मैं अपनी
अनवरत आभा में
छू लेता
वह छोर मौन का
जिससे
सम्बंधित है
मेरा होना


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१९ सितम्बर २०१० को लोकार्पित



Saturday, September 18, 2010

रिश्तों की कई नौकाएं


नदी का बहाव देखते हुए
पानी में आसमान के साथ
दिखाई देते हैं
बीती हुई कई घटनाओं के चित्र 
बैठे बैठे 
हँस पडा हूँ कभी 
और 
कभी उभरी है एक कसक 
 
रिश्तों की कई नौकाएं 
गुज़री हैं अभी फिर 
आँखों के सामने से 
सभी पर 
आभार पुष्प अर्पित कर 
तन्मयता से
आज 
फिर
छटपटा कर
नदी से पूछ रहा हूँ
पता उस सूत्र का
जो जोड़ता है
मुझे सबसे 
और
किसी एक क्षण
मुझे एकाकी भी 
कर देता है अनायास


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ सितम्बर 2010

Friday, September 17, 2010

आनंद के गीत


(चित्र ललित शाह )

जो कुछ मैं करता हूँ
या
जो कुछ होता है मेरे द्वारा
उसमें से
संतोष और आश्वस्ति का सतत सृजन
संभव है तभी
जब
हर बात अर्पित हो उसे
जो सर्वव्यापी है
वरना
सीमायें समझ की
किसी भी क्षण
अपेक्षा के असंतुलित समीकरण तक ले जाकर
व्यर्थ कर देती हैं
वह सब जो किया गया
और
लील लेती हैं उत्साह 
कुछ नया करने का

और वो जीना जीना ही कहाँ है
अगर हम दिन पर दिन
संकोच में सिमट कर
कुढ़ते या झल्लाते हैं
 
मुक्ति कैसे संभव है
समर्पण के बिना
चिरमुक्त वही हैं
जो उसके हो जाते हैं 

हम जब विराट से जुड़ कर
आगे कदम बढाते हैं
अनायास ही अपने विस्तार के
नए सोपान अपनाते हैं
 
और अपने रोम रोम में
उसके सामिप्य का बोध पाते हैं 
जिससे कर्म पथ के कण कण से
आनंद के गीत फूट जाते हैं 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१७ सितम्बर २०१०




Thursday, September 16, 2010

सूरज के नाम का आभार

अक्सर होता है
धूप में जगमगाते
हवा में लहराते
पत्ते
हमें इतना लुभाते
की
सूरज के नाम का आभार 
हम किसी पत्ते को दे आते

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका

१६ सितम्बर २०१० को लोकार्पित

Wednesday, September 15, 2010

अब अँधेरा ना छू सके हैं मुझे


(चित्र- ललित शाह )


बात अपनी छुपा रहा है कोई
यूं ही दामन छुडा रहा है कोई
 
याद टूटन की लेके साँसों में
आज फिर छटपटा रहा है कोई
  
फाड़ कर दर्द के सभी पन्ने 
आधी पुस्तक पढ़ा रहा है कोई

मैंने पूछा, अधूरेपन का सबब
खुद को पूरा बता रहा है कोई

उसको अच्छा लगे है सो जाना
रतजगे में सुना रहा है कोई

दाग एक बात का मिटाने को
खुद से खुद को हटा रहा है कोई

मैंने सोचा था, मिल गयी मंजिल
पर नया दर दिखा रहा है कोई
 
अब अँधेरा ना छू सके हैं मुझे 
ऐसे मुझमें समा गया है कोई
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ सितम्बर २०१०





Tuesday, September 14, 2010

मूल्यों के नाम पर



देखते देखते
एक अदृश्य सी रस्सी
बन कर फांसी का फंदा
लपेट लेती है
 समाज को

हम गलत दिशा से खींच खींच
कर रस्सी
अपनी घुटन बढाते हैं
अपने हाथों 
अपनी मृत्यु की तरफ बढ़ते जाते हैं

उनकी बात सुनते हैं
जो फंदे के कसने को
सही ठहराते हैं
मूल्यों के नाम पर
समझ के चतुर खेल में
जो सच्छे और सरल हैं
वो कई बार हार जाते हैं

बड़प्पन और बचाव में
यदि एक को चुनना है
तो जो हर बार बड़प्पन  को चुनेंगे
उनके निशान क्या ढूंढें से
कहीं मिलेंगे?
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १४ सितम्बर २०१० 


Monday, September 13, 2010

सहेजने के लिए


अब सजगता से
स्मरण कर रहा वह अनुभूति
जिसमें
ह्रदय और मन
दोनों
उसकी उपस्थिति के अनुभव से
स्पंदित हो
प्रसन्नता के नए नए 
गीत गुनगुना रहे थे मौन में

वह क्षण जब
हर सीमा विलीन हो रही थी
कृपा के सघन आलिंगन में
एक शाश्वत स्वर्णिम भोर सी
उभर आई थी 
मुझमें

वह क्षण जब 
धरती पर होते हुए भी
धरती के वासी नहीं रहे जाते हम
वह क्षण
उसके होने का एक अपूर्व दृश्य देख कर आते हैं
या कहीं कुछ अत्यंत अपना सा देख कर
भीतर से ही अनावृत हो प्रकट हो जाते हैं

ऐसे क्षण
सहेजने के लिए
निरंतर खुदको सहेजना होता है
शब्दों के पास
बैठ कर
नए नए ढंग से 
सीखता हूँ खुदको सहेजना

पर शब्द असमर्थता जताते हैं
कहते हैं
जो तुम्हारा है
वही हम तुम्हें दे आते हैं
तुम जिस भाव की महिमा अधिकाधिक गाते हो
बस उसी भाव का रूप हो जाते हो


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ सितम्बर २०१० 
कविता में
यह कहना होता नहीं
कि
बाबा की उपस्थिति का
भाव सघनता से
ह्रदय को स्पर्श कर गया कल
न्यूयार्क के बाल्डविन स्थित मंदिर में
जब
भारत से आयी एक
बाबा की परम भक्त वीणा गुप्ताजी
द्वारा बाबा की आराधना के बाद
उनके विग्रह से
विभूति प्रकटन के दृश्य का साक्षी बना
पहली बार

विभूति चरणों के साथ साथ
बाबा को पहनाये हुए
वस्त्र पर से भी उभर आयी थी

जो दिखा
वो चमत्कारिक था
पर जो नहीं दिखा
उसमें और भी बड़ा चमत्कार है

एक 
वो जो अनदेखा
अदृश्य
जुड़ कर हमसे
जोड़ता है हमें
अपार आन्तरिक समृद्धि से,
लील कर समस्त
चिंताएं
भर देता है
निर्मल, निश्छल प्रेम से
उस एक को
सौंपने समग्रता से स्वयं को
आरती करता हूँ
कविता दीप बन कर
ज्योत्स्ना फैलाती है
मुझे 
परम आनंद के
नए नए सोपान दिखाती है
और
फिर 
श्रीहरि के चरण छूकर
वही-कहीं लीन हो जाती है
साईं नाथ महाराज की जय !
ॐ श्री साईं राम गुरुदेव दत्ता!!

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ सितम्बर २०१०

मेरा विस्तार

 
लिखते समय
कौन सी बात
उछल कर
आ धमकती है शब्दों के साथ
निर्णय इसका
मेरा नहीं
उसका है
जो ले चुका है
निर्णय
मुझे बनाने का
 
हर बात 
मुझे बनाती है
किसी नए ढंग से
मेरा विस्तार मुझे दिखाती है
और जब
संकुचित हो जाता है मन
हर बात ठहर सी जाती है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

Sunday, September 12, 2010

सत्य की विजय पताका



बस
और थोडा सब्र
तसल्ली, ठहराव 
धीरे धीरे मिटेगा ही 
प्रलय का प्रभाव 

२ 
आशा 
अन्धकार को चीर कर
आज भी
देख लेती है
स्वर्णिम उजियारे की तस्वीर,
विस्मृत नहीं
मुक्ति की महिमा
चाहे पांवों में है ज़ंजीर


उसने
अंतिम शैय्या से
देखते हुए
रक्त-पात,
सुनते हुए
वेदना, क्रंदन 
अघात दर आघात,

इस बार 
फिर से दोहराया
डूबती साँसों में
छुपा वही एक गीत
तुम से साँसे हैं
पर तुम तो
साँसों से परे भी
अमिट हो मेरे मीत

हमारे
शाश्वत सम्बन्ध की
लाज बचाना
चाहे जैसे हो,
सत्य की विजय पताका
फहराना,

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ सितम्बर २०१०

Saturday, September 11, 2010

दुनिया प्यारी हो पाती है

और एक दिन
कुछ नई बातें
कुछ नए उत्तरदायित्व
प्रेम की पगडण्डी पर चलते हुए भी
कभी कभी
जान ही नहीं पाते
कितने सुहाने दृश्य
बिना देखे 
पीछे छोड़ आये हम 

तुम थाम कर रखना
एक बात मेरी
जिसमें
शामिल है तुम्हारी बात
और जिसके साथ
मेरी और तुम्हारी बात
हो गयी थी हमारी बात

वो बात
जो 'हमारी' हो जाती है
उसी से 
दुनिया प्यारी हो पाती है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ सितम्बर २०१०

Friday, September 10, 2010

अकाट्य मुक्ति का जादू

 
घेरा बनता है
दिन पर दिन
मेरे चारों ओर
एक के बाद दूसरा
 
मुक्ति के लिए
नए नए पैंतरे अपनाने की
सीख देता है कोई 
जैसे
हर स्थिति 
एक युद्ध हो
जैसे
हर संघर्ष
अस्तित्त्व की लड़ाई हो

प्रतिक्रिया के लिए
मानस द्वार पर सुनती थपथपाहट
अनदेखी कर
कई बार
बहने देता हूँ
स्थिति को
अपनी लय में
 
देखते हुए विराट को
कई बार
अपने आप
लुप्त हो जाता है 
बंदीगृह जैसा घेरा

मेरी दृष्टि में
अकाट्य मुक्ति का जादू
जगाने वाला
चिरमुक्त जो है
उसके प्रति आभार से देखता हूँ जब 
उमड़ आते हैं 
हृदय में
सबके लिए
प्यार ओर करूणा 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० सितम्बर २०१०


Thursday, September 9, 2010

तर्क के धुएं में



 
फिर से
बात-चीत अगुआ हो जाती है
समझ किसी शिखर पर
जाकर सो ही जाती है

धीरे धीरे
उतर आती हैं
नंगी तलवारें सड़को पर
हर एक जिव्हा पर
शूलों की खेती हो जाती है

हम
फिर फिर
भटक जाते हैं रास्ते
शांति छोड़ कर
जीने लगते द्वेष के वास्ते

अपनेपन की आदत
अपने-2 अस्त्तित्व की
खींच-तान में
ना जाने कहाँ खो जाती है 
देखते देखते
तर्क के धुएं में
जानी-पहचानी ज़मीन
 क्या से क्या हो जाते है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, ९ सितम्बर २०१०

Wednesday, September 8, 2010

विस्मित प्रवाह

(चित्र- मित्र ललित शाह के creative  चित्र कोष से )
मुझमें
ये क्या है
जो बदल जाता है
रात से दिन तक
ये कौन है
जो नए नए सन्देश लेकर मेरे भीतर उभर आता है
दिन भर की
 भागा-भागी में 
कभी सोच ही नहीं पाता 
 इस विस्मित प्रवाह से मेरा क्या नाता है

बस सुबह सुबह
एक ठहरे हुए क्षण में
जब यह अपनी अनिर्वचनीय आभा अनावृत कर
मुझ पर अपनी कृपा लुटाता है

अपने अपार विस्तार की एक महीन सी 
झलक दिखलाता है
तब इससे पूछ नहीं पाता
क्या ये ही है 
जो दिन भर मुझे भूल-भुल्लैय्या में घुमाता है
और क्या है वह बात
जो फिसलने, गिरने और उठने के अनुभव देकर
ये बड़े धैर्य से निरंतर सिखलाता है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ८ सितम्बर 2010




Tuesday, September 7, 2010

एक चित्र ठहरा हुआ

बस थोड़ी देर
अपने आप में गुम
रोक कर लहरें
लम्बे दरख़्त के नीचे से 
देख देख शांत सागर को
सहसा
फिर से कहा उसने
खेलो, अपनी आकाँक्षाओं, अपनी भावनाओं, अपने सपनो से
सागर!
चुप्पी तुम्हारी
बढ़ा रही है
वेदना
पवन की, रेत की, पंछियों की, पत्तियों की
अब ना रुको 
गाओ वो गीत 
जो अर्थहीन लगे चाहे 
अर्थ से भर देता है
सब कुछ 
और जिस क्षण 
सागर ने अपनी सहजता में
पहले की तरह अट्टहास किया 
हहरा कर बह आई लहरें 
मुस्कुरा कर कदम बढ़ाये उसने
जैसे 
पुनर्जीवित हो गया हो
एक चित्र ठहरा हुआ 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ सितम्बर २०१० 

Monday, September 6, 2010

अपने होने का उत्सव

 
 दो कवितायेँ 
 
खाली मंच
खाली सभागार
मौन की लय पर
सहसा
थिरकता मन
अपने एकांत के माधुर्य संग
करने लगा 
झूम झूम कर नृत्य

उल्लास उमड़ा
स्वर लहरी समर्पण की
गहराई धीरे धीरे

एक से अनेक
हो गए किस क्षण
कब भरा सभागार
कब 
छुपा छुपा होकर प्रकट
मनाने लगा अपने होने का उत्सव 
पता ही ना चला


मैं संक्रमण काल में
रहता हूँ हमेशा
या
काल वहीं है
आता-जाता मैं हूँ
अपने सपनो, अपने सन्दर्भों के साथ
रचता हूँ
नए नए सम्बन्ध
स्थिति से
मनःस्थिति से
और
नूतनता के साथ
कभी इठलाता
कभी घबराता
जब किसी व्यूह में पकड़ा जाता
समय पर सब दोष लगा कर
काल की देहरी पर
मुक्ति द्वार ढूंढता
एक ऐसे अनाम स्थल तक आता
जहां
मैं और तुम का भेद मिट जाता
फिर से स्वीकार्य हो जाती
मेरी विविधता की यह अनवरत गाथा 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ सितम्बर २०१०

Sunday, September 5, 2010

तृप्ति का एक नया गीत

बस इतना ही होना था
धूप उतरने के बाद
धीरे धीरे
फिर एक बार
फैलती छाया का सिमटना
सिमट कर
लुप्त हो जाना
और
एक क्षण अचानक
दिन के खो जाने
के बाद
काली चादर का फैलना
और
उस अँधेरे में
आश्वस्ति और विश्रांति का उपहार लेकर
मेरे ह्रदय में
तुमने जाग्रत रखी
वह भोर
जिसको जगाता है
शाश्वत सूरज

फिर एक बार
तुम्हारे नाम
अपना प्रेम पत्र लिखते हुए
यह जो
आभार के साथ
छलक आया है
पवन जल आँखों से
इसी से धोकर
तुम्हारे चरण
धन्य हुआ
तृप्ति का एक नया गीत
गुनगुना रहा तन्मयता से

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ सितम्बर २०१०

Saturday, September 4, 2010

मैत्री का हाथ



हो सकता है
ऐसा ही हुआ हो पहले भी
और देख ना पाया मैं
यह सूरज
इसी तरह सुन्दर लालिमा छिटकता
निकला होगा
अनजान विश्राम स्थल से
इसी तरह
ऊष्मा और आलोक प्रसारित हुए होंगे
पहले भी
शायद तब भी किरणों ने
मेरी तरफ मैत्री का हाथ बढ़ाया हो
इसी तरह
और मैं
देख ना पाया
ऐसे
जैसे देख कर आज
धन्य हो गया हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ सितम्बर २०१०
शनिवार

Friday, September 3, 2010

जिसे कोई क्षण पकड़ नहीं पाता

 
लिख कर मिटाने के बाद
कहाँ जाते हैं अक्षर?
क्या है जो अमिट होता है मन में?
 
बार बार
अमिट के साथ 
समय बिताने
क्षणभंगुर से पीछा छुड़ाता
कभी नहीं जान पाता
कि
हर क्षण में भी वही आता
जिसे कोई क्षण पकड़ नहीं पाता 


अपनी अपनी अलग अलग यात्रा करते 

एक ही गाडी से
एक ही स्टेशन पर
उतर कर भी
अपने अपने सपनो, आकाँक्षाओं
और चिंताओं की पोटली लादे
हम
विचरते हैं
अलग अलग संसार में
बाहर एक ही प्लेट फॉर्म से
एक ही नगर में
प्रवेश करते हैं 
पर
हम सबके लिए
एक ही जगह के
कितने अलग अलग मतलब होते हैं
 
इतनी विविधता के बीच
अगर कोई एक सूत्र है
तो वो अनंत ही हो सकता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ सितम्बर २०१०

Thursday, September 2, 2010

एक स्वर्णिम आलोक

 
उस क्षण
सब कुछ नहीं
बस
एक स्वर्णिम आलोक की
मद्धम सी अनुभूति
ठहर कर काँधे पर
क्षण से भी छोटे से हिस्से में
कैसे
अनायास
धर गयी ह्रदय में
इतनी शीतलता और आश्वस्ति
कि
लगता है
पर्याप्त है
यह पूंजी
सारी उम्र के लिए 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, २ सितम्बर २०१०

Wednesday, September 1, 2010

आलोक वृक्ष

 
अपने आप उतर आया उजाला
खिल गया घर आँगन
महक आत्मीयता की 
पसर कर
फैलने लगी खिड़की से बाहर
प्रेम की पुलक सुनकर
फुदकती चिड़िया ने
सुनाया गीत उल्लास का
सौंदर्य एक नया सा
निखर आया बस्ती में

वृक्ष यह 
मिलने-मिलाने के सार की
जड़ों वाला

उग सकता है 
हर मन में
हर घर में 
 
आओ 
आलोक वृक्ष लगाने का
नया अभियान छेड़ दें 
दे दें प्रमाण
अपनी और आने वाली पीढ़ी को
मानवता बंजर नहीं है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, १ सितम्बर 2010

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...