Tuesday, September 14, 2010

मूल्यों के नाम पर



देखते देखते
एक अदृश्य सी रस्सी
बन कर फांसी का फंदा
लपेट लेती है
 समाज को

हम गलत दिशा से खींच खींच
कर रस्सी
अपनी घुटन बढाते हैं
अपने हाथों 
अपनी मृत्यु की तरफ बढ़ते जाते हैं

उनकी बात सुनते हैं
जो फंदे के कसने को
सही ठहराते हैं
मूल्यों के नाम पर
समझ के चतुर खेल में
जो सच्छे और सरल हैं
वो कई बार हार जाते हैं

बड़प्पन और बचाव में
यदि एक को चुनना है
तो जो हर बार बड़प्पन  को चुनेंगे
उनके निशान क्या ढूंढें से
कहीं मिलेंगे?
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १४ सितम्बर २०१० 


1 comment:

वन्दना said...

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