Thursday, September 2, 2010

एक स्वर्णिम आलोक

 
उस क्षण
सब कुछ नहीं
बस
एक स्वर्णिम आलोक की
मद्धम सी अनुभूति
ठहर कर काँधे पर
क्षण से भी छोटे से हिस्से में
कैसे
अनायास
धर गयी ह्रदय में
इतनी शीतलता और आश्वस्ति
कि
लगता है
पर्याप्त है
यह पूंजी
सारी उम्र के लिए 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, २ सितम्बर २०१०

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...