Wednesday, September 1, 2010

आलोक वृक्ष

 
अपने आप उतर आया उजाला
खिल गया घर आँगन
महक आत्मीयता की 
पसर कर
फैलने लगी खिड़की से बाहर
प्रेम की पुलक सुनकर
फुदकती चिड़िया ने
सुनाया गीत उल्लास का
सौंदर्य एक नया सा
निखर आया बस्ती में

वृक्ष यह 
मिलने-मिलाने के सार की
जड़ों वाला

उग सकता है 
हर मन में
हर घर में 
 
आओ 
आलोक वृक्ष लगाने का
नया अभियान छेड़ दें 
दे दें प्रमाण
अपनी और आने वाली पीढ़ी को
मानवता बंजर नहीं है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, १ सितम्बर 2010

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

भगवान करे, मानवता लहलहाती रहे।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...