Friday, September 3, 2010

जिसे कोई क्षण पकड़ नहीं पाता

 
लिख कर मिटाने के बाद
कहाँ जाते हैं अक्षर?
क्या है जो अमिट होता है मन में?
 
बार बार
अमिट के साथ 
समय बिताने
क्षणभंगुर से पीछा छुड़ाता
कभी नहीं जान पाता
कि
हर क्षण में भी वही आता
जिसे कोई क्षण पकड़ नहीं पाता 


अपनी अपनी अलग अलग यात्रा करते 

एक ही गाडी से
एक ही स्टेशन पर
उतर कर भी
अपने अपने सपनो, आकाँक्षाओं
और चिंताओं की पोटली लादे
हम
विचरते हैं
अलग अलग संसार में
बाहर एक ही प्लेट फॉर्म से
एक ही नगर में
प्रवेश करते हैं 
पर
हम सबके लिए
एक ही जगह के
कितने अलग अलग मतलब होते हैं
 
इतनी विविधता के बीच
अगर कोई एक सूत्र है
तो वो अनंत ही हो सकता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ सितम्बर २०१०

2 comments:

वन्दना said...

बिल्कुल जी………………वो अनंत ही है।

प्रवीण पाण्डेय said...

ऐसे ही परिभाषित हो अनन्त।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...