Saturday, September 4, 2010

मैत्री का हाथ



हो सकता है
ऐसा ही हुआ हो पहले भी
और देख ना पाया मैं
यह सूरज
इसी तरह सुन्दर लालिमा छिटकता
निकला होगा
अनजान विश्राम स्थल से
इसी तरह
ऊष्मा और आलोक प्रसारित हुए होंगे
पहले भी
शायद तब भी किरणों ने
मेरी तरफ मैत्री का हाथ बढ़ाया हो
इसी तरह
और मैं
देख ना पाया
ऐसे
जैसे देख कर आज
धन्य हो गया हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ सितम्बर २०१०
शनिवार

2 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

बहुत खूब , सुन्दर रचना , पढ़कर अच्छा लगा !!!

अथाह...


धन्यवाद

प्रवीण पाण्डेय said...

किरणों की मित्रता स्वीकार कर लें।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...