Monday, September 20, 2010

आस-पास


चेहरा पोत कर
खाली रंगमंच में
अकेले
बीती हुई कामनाओं का
अभिनय करते हुए
गहराता है अहसास
कि
जो कुछ पुराना था
वो अब 
नया होकर
बना हुआ है आस-पास
 
 
हम जिस जिस तरह से
संदर्भो को अपनाते हैं
उसी के अनुसार
नए, पुराने
और पुराने, नए हो जाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० सितम्बर २०१०

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

दार्शनिक सेतु नये पुराने के बीच।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...