Sunday, September 12, 2010

सत्य की विजय पताका



बस
और थोडा सब्र
तसल्ली, ठहराव 
धीरे धीरे मिटेगा ही 
प्रलय का प्रभाव 

२ 
आशा 
अन्धकार को चीर कर
आज भी
देख लेती है
स्वर्णिम उजियारे की तस्वीर,
विस्मृत नहीं
मुक्ति की महिमा
चाहे पांवों में है ज़ंजीर


उसने
अंतिम शैय्या से
देखते हुए
रक्त-पात,
सुनते हुए
वेदना, क्रंदन 
अघात दर आघात,

इस बार 
फिर से दोहराया
डूबती साँसों में
छुपा वही एक गीत
तुम से साँसे हैं
पर तुम तो
साँसों से परे भी
अमिट हो मेरे मीत

हमारे
शाश्वत सम्बन्ध की
लाज बचाना
चाहे जैसे हो,
सत्य की विजय पताका
फहराना,

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ सितम्बर २०१०

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...