Thursday, September 16, 2010

सूरज के नाम का आभार

अक्सर होता है
धूप में जगमगाते
हवा में लहराते
पत्ते
हमें इतना लुभाते
की
सूरज के नाम का आभार 
हम किसी पत्ते को दे आते

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका

१६ सितम्बर २०१० को लोकार्पित

2 comments:

वीना said...

क्या बात कही है...बहुत अच्छी है

Swarajya karun said...

गागर में सागर जैसी संवेदनाओं से
परिपूर्ण कविता. अच्छा लगा अभिव्यक्ति का यह
अंदाज़. शब्दों के इस सफर में आपके काफिले में मैं
भी शामिल हो गया आज.

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...