Monday, May 31, 2010

थाम उसे जो अक्षय


रच रच
नित नूतन निज
आनंद उल्लास अमर,
बह आये
अमृत स्वर,

चल चल
उस पथ
जिस पथ पर महापुरुष
चले निर्भय,
छोड़ 
छूटना है जो 
थाम उसे 
जो अक्षय,

अनहद का नाद 
संग, 
वर केवल 
आत्म रंग,

शुद्ध, बुद्ध 
ओ प्रवीण
नित अनंत 
में हो लीन

चल चल
अब तीव्र हुई
अमृत की प्यास प्रिये
पग पग पर
कृपा चिन्ह
ले चल विश्वास प्रिये

चल चल
उस पथ
जिस पथ पर महापुरुष
चले निर्भय,
छोड़ 
छूटना है जो 
थाम उसे 
जो अक्षय,


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३३ मिनट
सोमवार, ३१ मई २०१०

Thursday, May 27, 2010

शाश्वत की समय सापेक्ष यात्रा


कविता 
हर दिन 
स्मृति के झरोखे से
देख लेना चाहती है
निश्छल मन

उत्सुकता से 
तलाशती है
कोमल, पावन, निष्कलंक उजाला

अमृत की अनाम बूँद का स्वाद 
अब तक
जगा रहा है आस्था

असहमति के बीच
कहीं
कोई एक टापू है ऐसा
जहाँ हम सब
अपनी अपनी पूर्णता के साथ
पहुँच कर
उस प्रेम का आदान-प्रदान कर सकते हैं
जो सबके हित में अपना हित मानता है

 इसी टापू पर से
शुरू हुई थी 
रचना संसार की

पर हर दिन अधूरी रह जाती है 
उस जगह को देखने की चाहत 
जहाँ से शुरू हुई थी
शाश्वत की समय सापेक्ष यात्रा


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बजे,
गुरुवार, मई २७, २०१०

Wednesday, May 26, 2010

अकारण प्यार का झरना


अब भी शेष है
 स्वर्णिम उल्लास 
मानस के किसी हिस्से में

बची है
आलोक की वो सघन बूँद
जिसमें अपने आपको
बारम्बार रचते हुए
अपार विस्तार पा लेने की संभावना है

अब भी
मुझमें शेष है
अकारण प्यार का झरना
जिसमें क्षमा करने की 
अक्षय ताकत है


पर इस निश्छल 
निर्बद्ध प्रेम पर अंकुश लगाता है
एक विचार,
कहीं न्याय विरोधी तो नहीं होगा
इस तरह हो 
जाना उदार,

और
मन के किसी कोने में
इस संशय का भी एक कतरा है
शत्रु भाव रखने वालों को
क्षमा करने से शायद
हमारे अस्तित्व को खतरा है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ बज कर २६ मिनट
बुधवार, २६ मई २०१०



अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर २० मिनट

Tuesday, May 25, 2010

जब तक हल- चल है


तसल्ली
इत्मीनान
आश्वस्ति
स्वीकरण
अपने आपको
अपनी स्थिति के साथ
पूरी तरह अपनाने की खूबी
जहाँ से आती है
वो जगह है तो 
भीतर ही कहीं
बस दिखाई नहीं देती
तब तक 
जब तक
हल- चल है, उथल- पुथल है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर २५ मिनट
मंगलवार, २५ मई २०१०

Monday, May 24, 2010

अपनी पहचान का पता


कविता की परिधि में
सब कुछ है यदि
तो
मैं  कविता के घेरे से बाहर
इस अज्ञात स्थल पर
पहुँच जाता कैसे ?


सृजनशीलता का द्वार
खुलता तो होगा 
मुझ में ही कहीं 
पर
बंद अपने लिए 
इस तरह अचानक 
हो जाता कैसे ?

३ 

तेज़ बारिश में
टूट टूट कर पेड़ से
रेत में आ गिरे 
नन्हे तिनके
पेड़ से अपना रिश्ता
निभाते हैं कैसे?

४ 

हर बार
नए सिरे से
पहचान का स्पर्श 
नयनों में जाग्रत करने वाला 
जो है
क्या वो भी
अपनी पहचान का पता 
भूल सकता है ऐसे?


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३५ मिनट
सोमवार, २४ मई २०१०

Sunday, May 23, 2010

सौम्य आनंद


ये कौन है
जो हर दिन
स्वच्छ कर देता
मन का गलियारा,
कहाँ से 
उतर आता स्फूर्तिदायक
अनुपम उजियारा,

ये कली सी भोर 
खुलने के पहले
किसको करती है नमन,
ये ध्यानस्थ 
सौम्य आनंद सा
सत्य है या स्वपन?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १५ मिनट
रविवार, २३ मई २०१०

Saturday, May 22, 2010

कहाँ पहुँचने के लिए


अब भटकते भटकते
पूछते भी नहीं हैं खुदसे 
कहाँ पहुँचने के लिए
शुरू हुई थी यात्रा

अब
जहाँ हैं
वहां जो कुछ आ जाता है सामने
उसी में
 अपना आप
डुबो देने का 
करते हैं असफल प्रयास

इस तरह खुदको तोड़ते
लहुलुहान करते
थकान और पीड़ा
का सामान भरते

हम
अब घाव लेने और देने को
मानने लगे हैं
जीने का पर्याय

इस दौर में
बारूदी सुरंग बिछे रास्ते से
गुजर रही है मानवता,

हम अधीर हैं
विचार उगने से पहले
ही
उन पर सही और गलत का
ठप्पा लगा देने 
और यूँ भी होने लगा है
आरोपित विचारों के नीचे
धंसता जा रहा है जीवन

सृजनशीलता में
 शांति और आनंद देने की
क्षमता धीरे धीरे घटने लगी है

इस दौर में
मौलिक सोच मरीचिका सी है
मूल तक जाने का धैर्य
बहुत दुर्लभ है

ऐसे में जब 
प्रार्थना के सिवा और कोई
चारा नहीं है
हम संशय, प्रतिस्पर्धा और डर में
प्रार्थना करने की पात्रता भी
खोने लगे हैं

अब जब
प्रार्थना से अधिक महत्वपूर्ण
ये लगता है
कि किसी तरह खुद को बचाएं,
 कहीं ऐसा ना हो
इस तरह जो बच पायेगा
उसमें हम अपना चेहरा 
देख ही ना पायें?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १५ मिनट
शनिवार, २२ मई २०१०

Friday, May 21, 2010

चलो शाश्वत तुम जीते मैं हारा

(नदी की गति मद्धम, ठहराव का भ्रम                  चित्र- अशोक व्यास )

1
लहर से मित्रता करके भी
मिलना तो है सागर में ही
जहाँ
ना लहर का लुभावना रूप होगा
ना उसका बल खाता बहाव
मौज गहरे सागर की
क्या मिल सकती है मुझे
लहर में
अपना आपा खोये बिना?

२ 
ये रात दिन
मैं अपने साथ
अपनी साँसों में
जिस बोध को बचाने की सतर्कता के साथ
जीने लगा हूँ अब

अक्सर लगता है
यह बोध ही
बचाए रखता है
मुझे 

३ 
यह सब जो इतना सहज, सरल 
और आसान सा लगता है
यही
सारी घटनाओं, संबंधों,
भावनाओं, आवश्यकताओं
और अवसरों के बीच
एक तारतम्य सा 

यह सब शरीर
में छुपा हुआ
खाने-पचाने का क्रम,
देने और अपनाने की
भावना का प्रकटन
 
इस बहु-आयामी
सृजनात्मक, गतिमान
भवसागर को बनाने वाला 
कैसे करता है
व्यवस्था इस 
'नित्य परिवर्तनशील 
विस्तृत सृष्टि की' 

४ 
हो सकता है कि
मिटटी का घरोंदा बनाने वाले
बच्चे के खेल की तरह
यहाँ
मिटटी भी वही है
बालक भी वही
और घरोंदे को मिटाने वाली हवा 
या उछल कर आती लहर भी वही

हो सकता है
वही है सब कुछ
तो फिर 
क्यूं अलग लगता है 
सबसे
मुझमें यह
'मैं का बोध?

इस मैं को लेकर
सब कुछ पहचानने 
और
इस 'सतत विस्तृत होते सृष्टि रूप' 
का सार जानने 
इसे अर्थ देने का 
अनवरत प्रयास भी
क्या खेल है उसका
जिसमें मेरा हार जाना
पहले से तय है


चलो शाश्वत 
तुम जीते
मैं हारा

अब ये तो बताओ
अपनी हार मानने की 
घोषणा करने
किसी पहाडी पर जाऊं
या पर्याप्त होगा
तुम्हारे नाम 
समर्पण दीप जला कर
सांस नदी में 
निरंतर अर्पित करता जाऊं ?


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १० मिनट
शुक्रवार, २१ मई २०१०



Thursday, May 20, 2010

कृपामयी क्षणों में

(गिरिराज जी की परिक्रमा के दौरान             चित्र - अशोक व्यास )

कितना कुछ है
जो हम जानते नहीं
कितना कुछ है
जो हम मानते नहीं

पर क्या ये सारा संसार 
हमारे जानने या मानने पर निर्भर है
क्या ये न्याय है बनाने वाले का
हम तो मरने वाले और वो अमर है?


कई बार हम
समस्या को नाम देकर भी
अहंकार से भर जाते हैं
परिभाषित कर पाने की
पात्रता पर ही इतराते हैं
समझ के एक टापू पर
अपने आप ठहर जाते हैं
मुक्ति के नाम पर 
बंधन का घेरा बनाते हैं


यह एक अदृश्य आलोक का हाथ
सहसा
अपार शक्ति, साहस और 
उल्लास से भर कर
हमारे ही माध्यम से
किसी क्षण 
सारे दुःख, दारिद्र्य, वैर,
क्षुद्रता और वासनाओं से
हमको छुड़ाता है

प्रत्येक क्षण 
पावन, सुन्दर, आनंद के
अपार झरने से निखर जाता है

ऐसे क्षण में
कुछ भविष्य के लिए बचाने का
कहीं किसी को जताने का
विचार नहीं आता है
क्योंकि
ऐसे कृपामयी क्षणों में
ना केवल
भूत, वर्तमान, भविष्य एक हो जाते हैं
हमारा अलावा कोई 'दूसरा'
रह ही नहीं जाता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २० मिनट
गुरुवार, २० मई २०१०

Wednesday, May 19, 2010

निश्चय करने की ताकत

(गेंद बिसर जाती है, उसकी उछाल याद रह जाती है - चित्र - अशोक व्यास)

कभी कभी
एक ही दिन में
कितने रंगों वाले भाव
मन के आँगन में
मेहमान बन जाते हैं 

कोई उल्लास जगाते हैं
कोई अवसाद बढ़ाते हैं
कोई सब एक करते
कोई दीवार बनाते हैं


आज के दिन
किस भाव का
करें
मन में स्वागत,
कौन देता है 
यह निश्चय 
करने की ताकत?



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
७ बज कर ४५ मिनट
बुधवार, १९ मई २०१०

Tuesday, May 18, 2010

जहाँ तक देख सकता हूँ

(क्या प्रतीक्षारत होता है पथ ?   चित्र - अशोक व्यास )


 
१ 

जहाँ तक देख सकता हूँ
यहाँ से
तुम परे हो उस दृष्टिछोर के
इसीलिए चलता हूँ
पर चलते चलते पाता हूँ
तुम और दूर होते जाते हो


तो क्या ऐसा करूं
जहाँ हूँ
वहीं ठहर जाऊं
और
किसी तरह
अपनी दृष्टिसीमा का
अतिक्रमण कर पाऊँ
या फिर तुम ही कर दो
कुछ ऐसा
की मैं
दृष्टि सीमा के शाप से
मुक्त हो जाऊं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ मई २०१०
मंगलवार, सुबह ६ बज कर 36 मिनट

Monday, May 17, 2010

आत्म-विस्तार का आलिंगन


 
( लो ऐसे अपनाओ हलचल, सिखाता है कलात्मक जल,  चित्र अशोक व्यास )

हर दिन
जितना कुछ पकड़ते हैं
उससे अधिक हमसे छूटता है

इस तरह 
सहज ही समय 
हमसे कुछ ना कुछ लूटता है

२ 

नए दिन के साथ 
भुला कर अपनी हार
 अपने को जीत लेने
होना होता है तैयार


हार भुलाने का अर्थ
हार के कारण भूल जाना नहीं
याद ये रखना है
किन बातों को दोहराना नहीं

देखना है अच्छी तरह
कौन सी बातों में बंधन है
और किस दिशा में
आत्म-विस्तार का आलिंगन है


जहाँ जहाँ हमने
संकोच में सिमट कर
क्षुद्रता को अपनाया,
वहां, वहां
हमने अपनी
जननी को लजाया

उसने कहा था 
अनंत के साथ खेलना 
और हमने
विराट के विरोधी को
अपना साथी बनाया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १३ मिनट
सोमवार, १७ मई २०१०

Sunday, May 16, 2010

अनंत का मुस्कुराना

(मेरे गुरु- स्वामी श्री ईश्वारानंद गिरी जी महाराज, संवित साधनायन, आबू पर्वत, राजस्थान)

झरे हैं 
मुक्ति के स्वर्णिम कण
मेरी गोद में,

चलने से पहले 
वस्त्र झाडे थे
गुरु ने
पास ही में यहाँ


गुरु स्पर्श से
बालू भी
मुक्तिदायिनी बन जाती है 

हर परिधि को चीर कर
अमित विस्तार को
सहज ही
अपनी हथेली में
रसीले फल की तरह दिखा
देते हैं गुरु  

पर फिर
शिष्य की हथेली के स्पर्श से
अपना रस छुपा लेता है
यह चिर मुक्ति के स्वाद वाला फल

३ 
गुरु सर्वज्ञ हैं
पर सारा खेल
अपने वश में नहीं रखा उन्होंने

शिष्य के
आन्तरिक जगत की रश्मियों से
प्रभावित होता है
शाश्वत का फल


जितना बड़ा अधिकारी 
उतनी बड़ी जिम्मेवारी

सृष्टा ने चाहा होगा सबको 
महान बनाना 
इसलिए हम पर निर्भर है
ईश्वर को अपनाना
या ना अपनाना

हम चाहें तो
जारी रख सकते हैं
यूँ ही भटकते जाना
या 
देख कर
गुरु वचनों में
अनंत का मुस्कुराना
शुरू कर सकते हैं
उसकी ओर कदम बढ़ाना

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बजे
रविवार, १६ मई २०१०

Saturday, May 15, 2010

प्यार का निश्छल प्रवाह


अहंकार
चतुर खिलाडी की तरह
कभी पीछे से
कभी ज़मीन तोड़ कर
या
बरसात की तरह 
ऊपर से टपक कर
पटखनी दे देता है हमें

और उसका सबसे 
जोरदार पैंतरा तो ये है
कि
वो हमारे स्वरुप का ढोंग रच कर 
अपनी गिरफ्त में ले लेता है हमें 

२ 
अहंकार साथी है यूँ तो हमारा
बस एक घेरा डाल देता है
एक सीमा से परे
हमारे जुड़ने और जोड़ने की
क्षमता को शून्य कर देता है


प्यार का निश्छल प्रवाह
संभव है तभी
जब
हम अपने विस्तार का जिम्मा
अहंकार को नहीं
उसे सौंपें
जिसके खेल से संसार है 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, ५ बज कर ४४ मिनट
१५ मई २०१०

Friday, May 14, 2010

नयेपन का स्वागत


अपनी बात कहने के
लिए
विरोध बाहर से ही नहीं
भीतर से भी होता है
सबसे बड़ा विरोधी है
आलस्य 
जो
अपनी बात को 
देखने के लिए आवश्यक
धैर्य और निरंतरता की आपूर्ति
किये बिना
परोस देता है
किसी भी सतही बात को
हमारी बात बना कर
अक्सर ये होता है
हम अपने
प्रमाद के जंगल में
ऐसी पगडंडियों पर पहुँच जाते हैं
जो
उसी घेरे में घुमाती रहती हैं हमें
जहाँ से बाहर निकलने के लिए
लगा कर सारी उर्जा
शुरू करते हैं
अपनी यात्रा हम
नए दिन के साथ
नयेपन का स्वागत करने के लिए
स्पष्टता चाहिए,

स्पष्टता इतनी सी
की हम
आडम्बर की परतों के पीछे 
तक जाएँ
और अपने वास्तविक चेहरे को
देखे बिना
चैन ना पायें


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ बज कर ५७ मिनट
शुक्रवार, १४ मई, २०१०

Thursday, May 13, 2010

प्यार करने की ताकत बचाएं


१ 
हिमालय की गुफा में 
ध्यान करते योगी का असर
क्या  दिख सकता है
न्यूयार्क की किसी सड़क पर


जब जब उभरता है
करुणा का स्वर
मदद करता है कोई
किसी की दौड़ कर

पहले से 
सुन्दर हो जाता है संसार
जब जब झांकता
साँसों से शाश्वत का सार 


हाँ!
कुछ लोग
नफरत, हिंसा और बैर से
आत्मीयता के पुल मिटाते हैं
धरती की छाती को 
लहुलुहान करते जाते हैं


पर हम भी क्या
देखा-देखी में 
नफरत की फसल उगायें 
या जैसे भी हो
मनुष्य मात्र से
प्यार करने की ताकत बचाएं?

----------------------------------------------------------


सिर्फ तात्कालिक को देख कर
करें जीवन निर्धारण
या
सर्वकालिक के चरणों में
करें आत्म-समर्पण

 व्यावहारिकता के नाम पर
आदर्शों को कर दें अस्वीकार 
या फिर
शाश्वत के आलोक में
सीखें सजाना अपने व्यवहार

 हम मूल की महानता देखें
या बन कर
प्रतिक्रिया का प्रवाह,
भूल जाएँ
आत्म-सौंदर्य अथाह?

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर २० मिनट पर
गुरुवार, १३ मई २०१०

Wednesday, May 12, 2010

सृष्टा की अकुलाहट


मुखौटा लगा कर 
नहीं बनती बात

धीरे धीरे 
विनय और श्रद्धा के साथ 
हटा कर
परत दर परत
 प्रकट होता है
नवजात शिशु सा 
नया चेहरा
सत्य का जब
    तब बनती है कविता  


कविता 
अहंकार की बू से
दूर भागती

स्वीकार लेती
हर पीड़ा, हर व्यथा
दे सकती 
 हर घाव के लिए
मरहम
सुलझा कर हर उलझन
दिखा सकती है रास्ता

छल की छाया देख
अदृश्य होने वाली
 सखी को
इस युग में भी 
इमानदार ह्रदय चाहिए  

कविता किसी दिन
चिड़िया बन कर आती है
कभी नदी
कभी सागर
कभी मेघ सी बरसती है
दिन-दिन नया रूप लेकर
हमें 
रूप के बंधन से छुड़ाती है
मुक्त गगन तक ले जाती है

कविता में जब 
सृष्टा की अकुलाहट 
झांक जाती है
अनंत की करूणा से 
 प्रेम की बारह मासी
फसल लहराती है




अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
सुबह ६ बज कर ५५ मिनट 
बुधवार, १२ मई २०१० 

Tuesday, May 11, 2010

अच्युत की गति का गान




उसे देखूं
जो हुआ
या उसे
जो हो सकता था
या फिर उसे
जो 'होने' और 'ना होने' से परे है


वह 
जो होकर भी 'होने' में बंधता नहीं है
वह
जो 'ना होने' के घेरे में फंसता नहीं है
वह
जो नित्य मुक्त, 
सतत विस्तृत होती चेतना है
निराकार होकर भी
स्वच्छ, सुन्दर कैसे है इतनी
कि 
उसके बोध मात्र से
झरती है स्फूर्ति, आत्मीयता, करूणा
और
सुलभ हो जाता
वैभव आत्म-तृप्ति का

उसका यशोगान कर
उज्जीवित होता
मन
छू लेता सृजनात्मक शिखर सा
या
कोई एक अनाम 
लेता है मन में अंगड़ाई ऐसे
कि
छिन्न-भिन्न हो जाता
क्षुद्रता का ताना-बना

विराट का 
मधुर, मादक अट्टहास सा
गूंजता है
मेरी शिराओं में
ऐसे की
फूटती है
प्रेम गंगा
सांसो से

पिघल कर बहते हुए
इस तरह
मिटता नहीं
अमिट हो जाता है
कुछ मुझमें जो

जीवन शायद 
इसी अच्युत की गति का गान है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४४ मिनट पर
मंगलवार, ११ मई २०१०

Monday, May 10, 2010

शाश्वत का उजियारा


दुलार कभी ग्रीष्म का,
कभी शीत का

हर मौसम में
एक माँ है
पुचकारने वाली
ताड़ने वाली
सवाल पूछ कर
निर्देश देने वाली

व्यवहार बदल कर
नए ढंग से
अपने आपको सहेजने का
संकेत लाता है
हर मौसम

2

सिकुड़ कर अपने आप में
नहीं रह सकते देर तक
बदन में
छुपी हुई हलचल
 बाहर आकर 
देना चाहती है
उसका परिचय
जिससे सब हलचल है

३ 
माँ 
याद दिलाती है 
बार बार,
जाओ अपने भीतर के 
स्वर्णिम कोष तक,
प्रमाद में बैठ कर
भूल ना जाना
कि
तुम अनमोल हो


आस्था की किरण 
श्रृंगार कर मन का
उन्ड़ेलती है
शाश्वत का उजियारा
एक सौम्य, सहज क्षण में

ऐसे में
मन को सहेजने की कला
जब सिखा रही थी माँ
तब ध्यान से सुनी होती उसकी बातें

तो शायद 
घेर ना पाता 
ये डर अनिश्चय का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ बज कर ४० मिनट 
सोमवार, १० मई २०१०

Sunday, May 9, 2010

आत्मीय सौन्दर्य की आभा लेकर

(स्थान - व्रज, पेन्सिल्वेनिया                             चित्र - रुनझुन अग्रवाल)

आग्रह मुक्ति का
बंधन बन सकता है
किसी एक क्षण

उस क्षण से मुक्त होने
सन्दर्भों से परे
सदा सारयुक्त रहने वाले का
करता हूँ स्मरण



अपने निर्देशांक
जिन जिन मापदंडो से
बना कर
बैठा हूँ 
जगत-व्यापार में

उन सबको
छोड़ कर
भर लेता हूँ
एक उड़ान
आत्म-गगन में

चुन कर ले आता
शांति की ताज़ी कलियाँ
प्रेम की नई सौरभ

लौट कर देखता हूँ
ऐसा आनंद उमड़ रहा है
मेरे चारो ओर
जो निर्भर नहीं
किसी पर

इस आनंद का उपहार
तुम तक पहुंचाने का आग्रह भी तो
एक बंधन है

पर जब तक
मुक्त रह कर
खेल सकता हूँ
इस बंधन से
मुखरित हूँ मैं

और फिर
मौन होकर 
देखता हूँ
 मेरी मंगल कामना
थपथपाती हैं 
द्वार तुम्हारा

यह भी कमाल की बात है
अब शुभ्र भाव मेरे
स्वतंत्र हो मुझसे 
विचरते हैं जगत मैं
आत्मीय सौन्दर्य की आभा लेकर 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ बज कर ३० मिनट
रविवार, ९ मई २०१०


Saturday, May 8, 2010

जहाँ है ही नहीं मृत्यु


कई बार नए सिरे से
नक़्शे पर अँगुलियों से
टटोलता हूँ
लक्ष्य की ओर
ले जाती रेखाएं

हर दिन
किरणों को अपनी हथेली पर रख कर
सुनता हूँ
सूरज का सन्देश

हर दिन 
अपने आपको
सन्दर्भों से अलग
सम्भावना की एक
स्वंतंत्र इकाई की तरह
अपना कर
महसूस करता हूँ
एक चिर्मुक्त सौंदर्य

हर दिन 
काल की गर्द झाड़ कर
नए सिरे से
स्वच्छ होता हूँ

विनयशीलता की छाँव से
पोषित करते
कालातीत वृक्ष के नीचे
मिल जाते हैं
कृतज्ञता का आस्वादन कराते
मधुर फल

हर दिन
आनंद का नूतन परिचय देते
मन के एक हिस्से में
देख कर
करता हूँ प्रार्थना

मुझ पर किसी का 
ऋण ना रह जाए

बनते हुए
पावन प्रेम प्रसार का
आस्थावान माध्यम
मैं 
वहां जीवित होता हूँ
जहाँ 
है ही नहीं मृत्यु

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ८ बज कर ५० मिनट
शनिवार, ८ मई, २०१०

Friday, May 7, 2010

बैठे हैं विराट की गोद में

बैठे बैठे
अच्छा लगने की अनुभूति
आती है जब
तब तक हम
चढ़ चुके होते हैं
हाँफते हाँफते
कोई ना कोई हिस्सा
ऊँचाई का,

चढ़ना हो
या आगे बढ़ना है
बैठ कर अच्छा लगने से पहले
कर चुके होते हैं हम
एक यात्रा

आतंरिक यात्रा के लिए भी
आवश्यक हैं
बाहर की क्रियाएं

कुछ संशोधन
कुछ सुरुचिपूर्ण परिवर्तन

व्यवस्था जो विराट की है
विस्मयकारी है
जुड़ा हुआ है
बाहर और भीतर
कहीं ना कहीं
किसी ना किसी तरह से

अभ्यास करते करते
जब हम
 साँसों के प्रयोग से 
भीतर और बाहर का भेद
मिटाते हैं

अनूठे ढंग से
संसार के हर रंग को
अपनाते हैं 
अकारण ही
 मुस्कुराते हैं
बैठे हैं विराट की गोद में
ये जान पाते हैं 

अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २० मिनट
शुक्रवार, मई ७, २०१०

Thursday, May 6, 2010

अनंत आयामों की गाथा

(ओढ़नी बदले अम्बा, नई ऋतु आये                    चित्र - अशोक व्यास )

यह क्या है
जो दिन को
सार्थक बना देता है
कभी स्थितियों को बदल कर,
कभी उन्ही सब
घटनाओं में
नए रंगों की शोभा छिड़क कर

लहलहाती फसल जैसे
मन में 
यह जो
संतोष और आनंद के
स्वर्णिम, पावन पत्ते से झरे हैं 

बताओ कैसे
सुरक्षित रखूँ माँ 
इस संपदा को 




माँ
कभी गोद में लेकर उछालती है
कभी बहलाती है
खिलौना देकर 

बांधती है माँ
मुक्त करने के लिए 

जाने पहचाने रास्तों पर 
मिलता है जब 
चिर-स्वतंत्रता का स्वाद,
नहीं जानते
कैसे संभाले
कहाँ सुरक्षित रखें 
असीम की इस अनुभूति को,

और ऐसे में
फिर एक बार
करते हैं माँ की पुकार

याद आ ही जाती है माँ
कभी कुछ ना होने पर
कभी सब कुछ होने पर

जीवन के हर मोड़ पर 
अम्बा का स्मरण 
ये बताता है
कि माँ के आलिंगन में
अनंत आयामों की गाथा है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ५० मिनट
गुरुवार, ६ मई २०१०

Wednesday, May 5, 2010

प्रवाह पूर्णता का


कहाँ से करें मूल्यांकन
उससे जो आज है
उससे जो कल था
या उससे जो कल हो सकता है


किसका करें मूल्यांकन
वह जो हुआ है
उसका, जिससे हुआ है
या उसका, जो होकर भी 
परे रहा है होने के

३ 
कितनी बार
अपनी मुट्ठी में ही
छुपा कर प्रेम पत्र
लौट कर सम्भावना के द्वार से 
बहाये हैं हमने
अदृश्य गंगा में

कितनी बार
आहत को भी
राहत की संज्ञा देकर
चढ़ते रहे 
हिमालय की नयी चोटियों पर


गति के लिए भी
खेलनी होती है
लुका-छुप्पी

कभी खुदको छुपाना होता है
कभी उसे
जिसके कारण
छुपे रहने का विचार 
कर लेते हैं हम 


प्रकट होने के लिए
सृजनशीलता और साहस के साथ
चाहिए समय भी

अनुकूल समय ऐसा 
जिससे समन्वित होकर
फैलें अभिव्यक्ति की किरणें


अभिव्यक्ति में
प्रतिभा के साथ
होती है कृपा भी

अव्यक्त, अनंत
मुस्कुरा कर ह्रदय से
करता है उजागर
प्रेम, सौंदर्य, आनंद

जैसे जैसे 
देख, पहचान महिमा उसकी
नतमस्तक होते हम
करके आलिंगनबद्ध 
अक्षय वात्सल्य उंडेलता है वह 

प्रकटन जो है
इस आत्म-तृप्ति के वैभव का
इसी से सुलभ है 
प्रवाह पूर्णता का 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ४८ मिनट
बुधवार, ५ मई २०१०

Tuesday, May 4, 2010

परिष्कार का प्रयास

(एक लघु फिल्म की शूटिंग हेतु, कैमरे के लिए सजने की प्रक्रिया )


और तब समय से
अपने अनुपस्थित होने का
मिल रहा था प्रमाण

नहीं पहुँच रहा था
लक्ष्य तक
अपना कोई बाण

हो ये रहा था
कि कुछ दे ही नहीं रहा था दिखाई
लोग नहीं थे
बस दिख रही थी परछाई


उसने सूक्ष्म रूप से
 पहाड़ की 
सबसे ऊँची चोटी पर जाकर 
जानना चाहा
क्या संभव है गति 
हर दिशा को अपना कर

३ 
सवाल सत्य का नहीं
सवाल हमारा होता है हमेशा
यदि हम सत्य है 
तो सवाल सत्य का है

जानना सत्य को नहीं
जानना तो अपने आप को है
कहते हैं
सत्य तो बदलता नहीं
पर हम तो 
बदलते रहते हैं दिन रात
तो क्या हम 'जो' हैं
वो सत्य नहीं है

अगर स्वयं को सत्य माने
तो अपने बहुत से हिस्से को
नकारना पड़ेगा

क्या ऐसा है कि
हमारा सत्य होना
किसी एक बिंदु से
प्रारंभ होता है
उसके पहले हम 'झूठ' होते हैं
और शायद
हम 'सच' और 'झूठ' के बीच
आते जाते रहते हैं

यदि ऐसा है कि
हम पुल हैं
सत्य और झूठ के बीच

तो क्या हम 'सत्य' से भी
बड़े नहीं हैं


यदि 'जीवन' सत्य है
और 'मृत्यु' झूठ
या 'जीवन' झूठ है
और 'मृत्यु' सत्य
तो इस तरह हम
'जीवन' और 'मृत्यु' दोनों से परे हैं


कभी कभी
हम सारा दिन
नींद में बिताते हैं
जहाँ भी जाते हैं
जुड़ाव नदारद
पाते हैं
दिन के दूसरे छोर
पर पहुँच कर भी
गति का अहसास
नहीं पाते हैं
6

कई सवाल
जब अनायास उठ जाते हैं
हम अपने आपको
बेवकूफ ठहराते हैं
फिर भी उनके साथ
बेमन से
कुछ दूर चलते जाते हैं
अपने आप उठे सवालों
को लेकर
किसी तरह जब 
खुदको छू पाते हैं,
आत्म-संतोष की
सुनहरी किरणों में
निखर जाते हैं



मुख्य बात है
खालीपन और
इस खालीपन से जंग,
जैसा भी
अपनाते हैं 
लड़ने का ढंग,
वैसे ही 
उभर आते है
नए नए रंग,

मुख्य बात ये है
कि पहुँच कर
खालीपन के पार 
जब अपने आप में
गूंजती है
पूर्णता की झंकार

तब सोचते हैं
की
यह 'पूरेपन की आश्वस्ति'
हमेशा रहने वाली है साथ,
पर ना जाने कैसे
छूट जाता है 
इस 'तन्मयता' का साथ


शायद कहीं ना कहीं
हममें
अपने शुद्ध रूप तक
पहुँच पाने की प्यास है
बस इसीलिए
कर्म के सहारे 
परिष्कार का प्रयास है 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ६ बज कर ४० मिनट
मंगलवार, ४ मई , २०१०

Monday, May 3, 2010

उजाले की पुकार


धुंए के पार
देखने की कोशिश 
होती है जब नाकाम 
हम
अनुमान लगा कर
चला लेते हैं काम

इतनी दूरी पर एक पेड़,
दूर दिखाई देता पहाड़
और एक मोड़
यहीं कहीं आस पास,
सब कुछ सोच कर
अनुमान के आधार पर
बिठाने लगते हैं
अपना विश्वास,

पर इस अनुमान जनित विश्वास में
शेष रह जाती संशय की एक दरार,
और तब धीरे धीरे चलते हुए 
विराट तक भेजते हैं उजाले की पुकार 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ५ बज कर ५५ मिनट
सोमवार, ३ मई २०१०

Sunday, May 2, 2010

सारयुक्त सतत विस्तार


परकोटे के चारों ओर
घूम घूम कर 
ढूंढते हैं
प्रवेश द्वार
कई बार
बंद किले के
जब हमें देखना होता है
सूरज को 


सूरज को किले में
बंद कर
ताले की चाबी
छुपाई होती है
अपने ही दिल में

और दिल के द्वार की
चाबी
कहीं रख कर 
भूल जाते हैं


बात अपने
ही भीतर उतरने की
होती है
जब जब भी
हम उजाले के लिए
तड़पते हैं
कसमसाते हैं

और अपने
चारों ओर 
घूम घूम कर
हम ढूंढते हैं
जो प्रवेश द्वार
कई बार
उसे छुपाये होता है
हमारा 
अहंकार 

३ 

एक समय ऐसा भी आता है
जब समझ थक कर
सुस्ताने चली जाती है

कोई पागल पवन 
हमें उठा कर
झूला सा झुलाती है 

तब जब 
अपने आप पर
नहीं होता हमारा अधिकार
उछाल से पवन की
हम इस पार गिरें या उस पार

इसके निर्णय का
है जिस पर दारोमदार
वो ही दे सकता है
सारयुक्त सतत विस्तार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ९ बज कर १० मिनट
रविवार,  मई २, २०१०

Saturday, May 1, 2010

होने ना होने से परे

(बाल्डविन, न्यूयार्क स्थित साईं मंदिर में लिया गया चित्र -      अशोक व्यास)

सबके साथ  
होकर भी 
 कई बार
 हमें घेर लेता है
अकेलापन,

और कभी
अनायास
मिल जाता 
अंतस में अपार 
अपनापन,

हम 
संबंधों के पुल बनाते हैं
या 
उन्हें उपहार में पाते हैं
बहुत कुछ 
ऐसा होता है जीवन में
जिसे
हम समझ नहीं पाते हैं

फिर भी एक जिद सी
कि हर बात को समझ के
दायरे में लाना है
और हम ही सर्वज्ञ हैं
ऐसा औरों को ना सही
खुद को जताना है

सीमाओं को स्वीकारे बिना
नहीं होता असीम का अनुभव
और फिर जब हर सीमा में
दिखता है अनंत का गौरव

महसूस होता है
होने ना होने से परे भी
है कोई एक स्थल,
जो स्थिर है
परे समय के
पर उसी से है हर पल,

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १५ मिनट
शनिवार, मई १, २०१०





n

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...