Thursday, May 20, 2010

कृपामयी क्षणों में

(गिरिराज जी की परिक्रमा के दौरान             चित्र - अशोक व्यास )

कितना कुछ है
जो हम जानते नहीं
कितना कुछ है
जो हम मानते नहीं

पर क्या ये सारा संसार 
हमारे जानने या मानने पर निर्भर है
क्या ये न्याय है बनाने वाले का
हम तो मरने वाले और वो अमर है?


कई बार हम
समस्या को नाम देकर भी
अहंकार से भर जाते हैं
परिभाषित कर पाने की
पात्रता पर ही इतराते हैं
समझ के एक टापू पर
अपने आप ठहर जाते हैं
मुक्ति के नाम पर 
बंधन का घेरा बनाते हैं


यह एक अदृश्य आलोक का हाथ
सहसा
अपार शक्ति, साहस और 
उल्लास से भर कर
हमारे ही माध्यम से
किसी क्षण 
सारे दुःख, दारिद्र्य, वैर,
क्षुद्रता और वासनाओं से
हमको छुड़ाता है

प्रत्येक क्षण 
पावन, सुन्दर, आनंद के
अपार झरने से निखर जाता है

ऐसे क्षण में
कुछ भविष्य के लिए बचाने का
कहीं किसी को जताने का
विचार नहीं आता है
क्योंकि
ऐसे कृपामयी क्षणों में
ना केवल
भूत, वर्तमान, भविष्य एक हो जाते हैं
हमारा अलावा कोई 'दूसरा'
रह ही नहीं जाता है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर २० मिनट
गुरुवार, २० मई २०१०

2 comments:

कुमार राधारमण said...

ओशो ने भी कहा है कि भग्वद्कृपा जिस पर बरसती है,वही जानता है।

आनन्‍द पाण्‍डेय said...

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