Wednesday, May 12, 2010

सृष्टा की अकुलाहट


मुखौटा लगा कर 
नहीं बनती बात

धीरे धीरे 
विनय और श्रद्धा के साथ 
हटा कर
परत दर परत
 प्रकट होता है
नवजात शिशु सा 
नया चेहरा
सत्य का जब
    तब बनती है कविता  


कविता 
अहंकार की बू से
दूर भागती

स्वीकार लेती
हर पीड़ा, हर व्यथा
दे सकती 
 हर घाव के लिए
मरहम
सुलझा कर हर उलझन
दिखा सकती है रास्ता

छल की छाया देख
अदृश्य होने वाली
 सखी को
इस युग में भी 
इमानदार ह्रदय चाहिए  

कविता किसी दिन
चिड़िया बन कर आती है
कभी नदी
कभी सागर
कभी मेघ सी बरसती है
दिन-दिन नया रूप लेकर
हमें 
रूप के बंधन से छुड़ाती है
मुक्त गगन तक ले जाती है

कविता में जब 
सृष्टा की अकुलाहट 
झांक जाती है
अनंत की करूणा से 
 प्रेम की बारह मासी
फसल लहराती है




अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
सुबह ६ बज कर ५५ मिनट 
बुधवार, १२ मई २०१० 

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