Monday, May 24, 2010

अपनी पहचान का पता


कविता की परिधि में
सब कुछ है यदि
तो
मैं  कविता के घेरे से बाहर
इस अज्ञात स्थल पर
पहुँच जाता कैसे ?


सृजनशीलता का द्वार
खुलता तो होगा 
मुझ में ही कहीं 
पर
बंद अपने लिए 
इस तरह अचानक 
हो जाता कैसे ?

३ 

तेज़ बारिश में
टूट टूट कर पेड़ से
रेत में आ गिरे 
नन्हे तिनके
पेड़ से अपना रिश्ता
निभाते हैं कैसे?

४ 

हर बार
नए सिरे से
पहचान का स्पर्श 
नयनों में जाग्रत करने वाला 
जो है
क्या वो भी
अपनी पहचान का पता 
भूल सकता है ऐसे?


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर ३५ मिनट
सोमवार, २४ मई २०१०

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