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(स्थान - व्रज, पेन्सिल्वेनिया चित्र - रुनझुन अग्रवाल) |
आग्रह मुक्ति का
बंधन बन सकता है
किसी एक क्षण
उस क्षण से मुक्त होने
सन्दर्भों से परे
सदा सारयुक्त रहने वाले का
करता हूँ स्मरण
२
अपने निर्देशांक
जिन जिन मापदंडो से
बना कर
बैठा हूँ
जगत-व्यापार में
उन सबको
छोड़ कर
भर लेता हूँ
एक उड़ान
आत्म-गगन में
चुन कर ले आता
शांति की ताज़ी कलियाँ
प्रेम की नई सौरभ
लौट कर देखता हूँ
ऐसा आनंद उमड़ रहा है
मेरे चारो ओर
जो निर्भर नहीं
किसी पर
इस आनंद का उपहार
तुम तक पहुंचाने का आग्रह भी तो
एक बंधन है
पर जब तक
मुक्त रह कर
खेल सकता हूँ
इस बंधन से
मुखरित हूँ मैं
और फिर
मौन होकर
देखता हूँ
मेरी मंगल कामना
थपथपाती हैं
द्वार तुम्हारा
यह भी कमाल की बात है
अब शुभ्र भाव मेरे
स्वतंत्र हो मुझसे
विचरते हैं जगत मैं
आत्मीय सौन्दर्य की आभा लेकर
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ बज कर ३० मिनट
रविवार, ९ मई २०१०
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