Monday, May 17, 2010

आत्म-विस्तार का आलिंगन


 
( लो ऐसे अपनाओ हलचल, सिखाता है कलात्मक जल,  चित्र अशोक व्यास )

हर दिन
जितना कुछ पकड़ते हैं
उससे अधिक हमसे छूटता है

इस तरह 
सहज ही समय 
हमसे कुछ ना कुछ लूटता है

२ 

नए दिन के साथ 
भुला कर अपनी हार
 अपने को जीत लेने
होना होता है तैयार


हार भुलाने का अर्थ
हार के कारण भूल जाना नहीं
याद ये रखना है
किन बातों को दोहराना नहीं

देखना है अच्छी तरह
कौन सी बातों में बंधन है
और किस दिशा में
आत्म-विस्तार का आलिंगन है


जहाँ जहाँ हमने
संकोच में सिमट कर
क्षुद्रता को अपनाया,
वहां, वहां
हमने अपनी
जननी को लजाया

उसने कहा था 
अनंत के साथ खेलना 
और हमने
विराट के विरोधी को
अपना साथी बनाया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ७ बज कर १३ मिनट
सोमवार, १७ मई २०१०

No comments:

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...