Sunday, May 2, 2010

सारयुक्त सतत विस्तार


परकोटे के चारों ओर
घूम घूम कर 
ढूंढते हैं
प्रवेश द्वार
कई बार
बंद किले के
जब हमें देखना होता है
सूरज को 


सूरज को किले में
बंद कर
ताले की चाबी
छुपाई होती है
अपने ही दिल में

और दिल के द्वार की
चाबी
कहीं रख कर 
भूल जाते हैं


बात अपने
ही भीतर उतरने की
होती है
जब जब भी
हम उजाले के लिए
तड़पते हैं
कसमसाते हैं

और अपने
चारों ओर 
घूम घूम कर
हम ढूंढते हैं
जो प्रवेश द्वार
कई बार
उसे छुपाये होता है
हमारा 
अहंकार 

३ 

एक समय ऐसा भी आता है
जब समझ थक कर
सुस्ताने चली जाती है

कोई पागल पवन 
हमें उठा कर
झूला सा झुलाती है 

तब जब 
अपने आप पर
नहीं होता हमारा अधिकार
उछाल से पवन की
हम इस पार गिरें या उस पार

इसके निर्णय का
है जिस पर दारोमदार
वो ही दे सकता है
सारयुक्त सतत विस्तार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सुबह ९ बज कर १० मिनट
रविवार,  मई २, २०१०

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