Saturday, May 15, 2010

प्यार का निश्छल प्रवाह


अहंकार
चतुर खिलाडी की तरह
कभी पीछे से
कभी ज़मीन तोड़ कर
या
बरसात की तरह 
ऊपर से टपक कर
पटखनी दे देता है हमें

और उसका सबसे 
जोरदार पैंतरा तो ये है
कि
वो हमारे स्वरुप का ढोंग रच कर 
अपनी गिरफ्त में ले लेता है हमें 

२ 
अहंकार साथी है यूँ तो हमारा
बस एक घेरा डाल देता है
एक सीमा से परे
हमारे जुड़ने और जोड़ने की
क्षमता को शून्य कर देता है


प्यार का निश्छल प्रवाह
संभव है तभी
जब
हम अपने विस्तार का जिम्मा
अहंकार को नहीं
उसे सौंपें
जिसके खेल से संसार है 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, ५ बज कर ४४ मिनट
१५ मई २०१०

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