Saturday, April 30, 2011

सूरज उसकी मुट्ठी में है


उसने ये दावा किया
की सूरज उसकी मुट्ठी में है
और लोग
सूरज की तरफ देखना छोड़ कर
उसके पीछे हो लिए

 अपमानित होने से परे है ईश्वर
पर
कुछ तो टूटता है
परम्पराओं के छिछले विश्लेषण से,
जिन्हें नींव होना चाहिए 
समाज की
वे बन कर रह जाते आभूषण से,

3

अभी तक
वही किस्सा दोहराया जा रहा है
छल करने के लिए
पुराना नुस्खा आजमाया जा रहा है
हम बैठ गए है
सम्मोहित होकर, सरल समाधान के लिए
हमारी आँखों पर
शब्दों का नया काजल लगाया जा रहा है

कुछ इधर से आये
कुछ उधर से 
कुछ सम्मानित होने आये
कुछ सम्मान का नाटक देखने
सब मिल कर
इधर- उधर से
झूठ के गलियारे में
आँखों पर पट्टी बांध कर
आकाश के विस्तार का गुणगान करते रहे

5

वो सब मिल कर
अपनी-अपनी समझ से
जैसे-जैसे करते हैं 
मानवता की सेवा

कहीं कोइ एक त्रुटि के कारण
उस सेवा के फलस्वरूप
गिरती जाती है मानवता
6

प्रमाणिकता का परिचय
कहाँ छोड़ आये हम
कुछ देर भी
इस पर विचार किये बिना

स्वयं को प्रमाणिक मानने वालों 
से चमत्कृत
मिल जुल कर
मायार्पण करते रहे 
हम
एक सम्भावना का

7

हमें सम्भावना लुभाती है
हम सीमाओं से परे जाने की छटपटाहट में
एक सीमा से छूटते हुए
अपने 
समग्र विकास की सम्भावना को
नकार देते हैं

पर अपनी इस हानि का अफ़सोस नहीं होता हमें

हमें पता ही नहीं की
हमने क्या खोया है

हम उसके पीछे लगे हैं
जिसने ये दावा किया
की सूरज उसकी मुट्ठी में है
और वो
कुछ किरणे हमारे हवाले करके
हमें भी कर सकता है 
मालामाल 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३० अप्रैल २०११


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, ३० अप्रैल २०११  

Friday, April 29, 2011

उसके होने का उत्सव


अब  तक जो है
उसके होने का उत्सव
जो छूटा, सो छूटा
साथ है सदा केशव

मौन की बगिया में
आनंद की ताल पर
लिख गयी सन्देश
एक किरण भाल पर

ठहरना नहीं
चलते जाना है
और अपने आप में
 रम जाना है 

बीज छुप जाता है
तब वृक्ष आता है

बीज शाश्वत का
भीतर हमारे, अंकुरित हो, पल्लवित हो,  लहलहाए
अपने विशिष्ट ढंग से
जीवन का मंगलमय रूप लिए, प्रकट होता जाए   

जीवन क्या है
 अनंत का उद्भव
अब तक जो है
उसके होने का उत्सव


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२९ अप्रैल २०११  

    
      

Thursday, April 28, 2011

ये जो भीतर का साम्राज्य है



हम एक दुसरे के हिस्से का
सुख-दुःख
बाँट सकते है
कुछ हद तक
पर कोई किसी का हाथ
पकड़ कर
नहीं ले जा सकता
सरहद तक



ये भी उसका विधान है
की वैसे रास्ता आसान है
पर किसी न किसी बात पर
हर तरफ घमासान है   

पार जाने की ललक
जब तक भीतर से नहीं आती
सारी सुविधाएँ
और अनुकूलता धरी रह जाती

ये जो भीतर का साम्राज्य है
यहाँ बैठ कर कोई हमें नित्य छलता है
और वो इतना चतुर है की
ठग लिए जाने का पता भी नहीं चलता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ अप्रैल २०११   

 

 

         

सीमाओं का ताना-बना


1
और सहसा
किसी चिड़िया ने चोंच मार कर
प्रविष्ट कर दिया उसमें
कसमसाहट भरता विचार

तो क्या
जीवन इतना सा ही रहा
अपने आप में उलझ कर
देख ही ना पाया विस्तार?


जीवन क्या उतना ही है
जितना देता है दिखाई
क्यूं पीड़ादायक लगती है
ये सीमाओं की परछाई

हर दिन स्वयं को सहेजते सहेजते 
बीत जाता है
कौन तय करता है, किसके हाथ में
क्या आता है

और जो कुछ पाया
कई बार, वह सब अर्थहीन भी हो जाता है
खंडित होने का अनुभव
चाहे जहाँ से आये, हमें नहीं सुहाता है

तो फिर
नीली छतरी तले 
फिर से सम्पूर्णता का अनुसंधान
कभी कभी
मुक्ति के लिए आवश्यक है
अपनी मूढ़ता की पहचान


पावन नदी में डुबकी लगा कर
इस बार उसने
मांग लिया अपना ही उद्धार
अंजुरी में उसकी
प्रकट हुआ
विस्तार का सार
 "अगर सीमा रहित को अपनाना है
तो जो जिसका है, उसे लौटाना है
भीतर से भी, छोड़ना है संग्रह का आग्रह
वरना जीवन सीमाओं का ताना-बना है "
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, 28 अप्रैल 2011   

    

         

Wednesday, April 27, 2011

बस और क्या?


जैसे 
गुलाब की पत्ती पर ओस की बूँदें
जैसे
स्निग्ध माधुर्य में भीगा वातावरण
एक सतरंगी उल्लास सा
सौम्य उत्सव से अलंकृत क्षण

मेरी हथेली पर
भोर के साथ
कैसी बहुमूल्य दौलत धर देता है वह

रोम रोम से
हर एक पल
उसका गुणगान करके भी
इसके बराबर तो नहीं पहुँच सकता

बस मौन में
नम आँखों से
पत्तियों के साथ छेड़ करती हवा को देख कर
शुद्ध सौन्दर्य का एक स्वर
   उभरता देखता हूँ अपने भीतर से

और
मेरे-तुम्हारे की विभाजन रेखा
लुप्त सी हो जाती है
देने वाले भी तुम
लेने वाले भी तुम

मैं 
तुम्हारे होने का साक्षी
विस्तृत होती चेतना के साथ
मगन पूर्णता के इस प्रसाद में

बस और क्या?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ अप्रैल २०११  
   

Tuesday, April 26, 2011

एक क्षण सम्भावना का


पहले अधीरता,
उतावलापन
अहंकार
फिर
धैर्य
शांति और
कृतज्ञतापूर्ण प्यार


पहले पसंद-नापसंद
अनबन
कुछ करने
कुछ बनने का आग्रह प्रबल
फिर समर्पण
समन्वय
           साँसों में शाश्वत का संबल            

पहले अलगाव 
दीवार
क्षुद्रता, एकाकीपन और असंतोष का गान
फिर सामिप्य
सार
आत्मीयता, आनंद और तन्मयता की तान


पहले और बाद के मध्य
एक क्षण सम्भावना का
कृपा के नए झरने में 
करवा देता है स्नान
अहा! 
हमें धारण करने वाला
कितना दयालु
अपार, अनंत
कितना महान


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, २६ अप्रैल २०११      

Monday, April 25, 2011

निराकार के प्यार का



पलट कर
मिटा दिया उसने
वो सब चिन्ह
जिनसे फैलती थी उदासी
अपने साथ
कोठारी में 
ले आया वो
धूप की संगत ज़रा सी
 
 
उसने
फिर एक बार
दृष्टि को
काल मुक्त झरने में
करवा दिया स्नान
पक कर
टपक गया
काल वृक्ष से स्वतः
हर समस्या का समाधान
 
 
वो इस बार
घर लौटा था
खाली हाथ
पर इस बार
उसके आने मात्र से
बदल गए हालात
 
 
यह क्या हो गया
किसका स्पर्श था
कहाँ से फूटा
यह नया झरना आभार का
जाग गया बोध
फिर से उसमें
नित्य मुक्त करते
निराकार के प्यार का 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ अप्रैल २०११    

Sunday, April 24, 2011

जब शायद पृथ्वी भी नहीं थी


सत्य के स्वर्णिम आलोक में स्नान करवाता
वह एक ज्वार सा
उतरने लगा है

खुरदुरे सन्दर्भों की ज़मीन पर 
पहुँचने से पहले
अनंत सौंदर्य का संपर्क खो देने का डर है 

ऐसे में
सृष्टि का सार बचा कर
सब कुछ समन्वित करने के लिए
जिसे पकड़ सकता हूँ
वह बस 'मैं' हूँ

अपना हाथ थाम लेने के लिए
आवाहित करता हूँ 'शब्द'
वे 'शब्द' जो 
तुमने मुझे दिए
जिनमें 'विराजमान' हो तुम
तब से
जब शायद पृथ्वी भी नहीं थी


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, २४ अप्रैल २०११    
 

Saturday, April 23, 2011

विराट के नाम करते रहो पुकार


अब हर दिन
उसकी दृष्टि से देखते हुए 
संसार को
बार बार मुझ पर खुलती है 
ये बात
की मैंने कितना कम देखा
मैंने कितना कम जाना

और
अपने हाथों लगाई गयी
कुछ कुछ गांठों को खोलते हुए
हर दिन
अपने बंधन से 
थोडा थोडा मुक्त होता हूँ     


अब हर दिन
तुम्हें जानने की कोशिश में

विस्मित होता हूँ
कैसे निरंतर
एक चलचित्र की तरह
दीखता रहा है संसार तुम्हें
और
कितनी सारी परतों का परिचय
                                                             तुम्हारी आत्मीय विश्लेषण से
होता रहा है उजागर

शायद कालातीत की संनिद्धि में
सहज हो जाता है
तुम्हारे साथ समय के इतने सारे आयामों  को
एक साथ देख पाना


किसी निश्छल क्षण में
ये बोध भी
खुला है मुझ पर
की तुम आदि-अंत रहित उपस्थिति के
उल्लास की तान में
जिसका गौरव गान करते रहे हो
वह प्रकट होना चाहता रहा है मेरे द्वारा भी
और
मैं उसका रास्ता रोके हूँ
और वह अपार शक्ति का स्वामी
मुझ अकिंचन का इतना सम्मान करता है
की बनाये रखता है 
मेरी स्वतंत्रता 
पर क्या ये ठीक है
की स्वतंत्रता के नाम पर
मैं सीमित और क्षुद्र बना रहूँ
और
वो चुपचाप देखता रहे


फिर फिर मुझे लगता है
तुम मुस्कुरा कर
परीक्षा में संकेत देते साथी की तरह
स्मृति धारा में बार बार आते हो
और 
अपने सौम्य मौन में मुझे बताते हो
सहजता से शिकायतों की गांठें खोल जाते हो
कहते हो, स्वतंत्रता का ठीक-ठीक उपयोग करो
अपने उत्थान के लिए इस सनातन शक्ति का प्रयोग करो

विराट के नाम करते रहो पुकार
कहो, प्रस्तुत हूँ, छोड़ क्षुद्रता, अपनाने विस्तार
कहो, अनुमति ही नहीं, आग्रह भी है अनंत
मानव बनाया, धन्यवाद, अब करो मेरा उद्धार   
   
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, २३ अप्रैल २०११  

Friday, April 22, 2011

उजियारी राशि का वह दूसरा हिस्सा


दिन सूर्योदय से नहीं
मन के उदय होने से खुलता है

मन को उदित करने वाली
प्रेरक आभा
उंडेलता है
एक वह
प्रतिदिन
पर उसके लिए
जो इसे देखे, इसे पहचाने

कई बार
कई कई बरस बीता जाते हैं
दिन के दरसन किये बिना

हमारे लिए दिन करने वाले हम ही हैं
सूरज की हमारी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं

दिन सार्थक 
तब बनता है
जब सूरज सृजित दिन के अर्द्ध हिस्से
को पूर्ण कर देता है
हमारे हिस्से का दिन

किरणे अपार धैर्य और
चिर सौन्दर्य को साथ ले
आती हैं हम सबके द्वार
पूछती हैं भोर होने पर
हमारे मन से
'लाओ कहाँ है
उजियारी राशि का 
वह दूसरा हिस्सा
जिसे
तुम्हारे मन से प्रकट होना था?'


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                   शुक्रवार, २२ अप्रैल २०११                

Thursday, April 21, 2011

छुपा-छुप्पी का रसमय खेल


कविता नहीं लिखता
वह
सहेजता है 
आन्तरिक वैभव
और भाव पुष्प चुन चुन कर
कर देता अर्पित
नित्य नूतन को


कविता नहीं लिखता वह
सजगता से
बंद कर देता है
छिद्र नौका का
डूबने से बचाते शब्द
हर दिन उसे


कविता नहीं
स्वयं को देखने का
एक पावन क्रम
ले जाता है 
हाथ पकड़ कर
सतह से नीचे
जैसे कोई पोता
अपने दादा की अंगुली पकड़ कर
चलना सीखे

और फिर
चलता हो किसी दिन
सांझ के बेला में
बाबा का हाथ पकड़
मंदिर की पगडंडी पर
ये देखता की 
किसी पत्थर से ना टकरा जाए
पाँव बूढ़े दादा का


कविता नहीं
जीवन लिखता है वह

जीवन होना है

कविता होने की प्रक्रिया को
जन्म देती, पालती-पोसती
सार्थकता का सिंचन करती है
साँसों में

सार-धार में
अक्षय प्रेम की झिलमिलाहट
चमकती है
दिन की छाती पर

कविता अपने उजियारे से
सुनहरा का देती है काल

हर दिन को उत्सव बना देता
एक कोई
कविता में छुप कर

कविता खेलती है
उसी 'एक' के  साथ
           छुपा-छुप्पी का रसमय खेल         
   

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
      गुरुवार, २१ अप्रैल २०११        

Wednesday, April 20, 2011

अनंत करता है प्रतीक्षा हमारे भीतर


1
तुम मेरे लिए
इतना कुछ कर गए हो
अपने भीतर प्रवेश का द्वार दिखा कर

और
अपने भीतर 
कहाँ, क्या, कैसे देखूं
सब कुछ संकेतों में
रख छोड़ा है
विरासत के रूप में 
मेरे लिए

बिना तुम्हारे
वंचित रहता 
इस विस्तार से
जो है सभी के लिए
सभी के भीतर
पर
समझ बढ़ने के साथ 
हम परे धकेलते जाते हैं
अपने भीतर प्रवेश द्वारा का परिचय

तुमने 
मुझसे मेरी दूरी मिटाने के लिए
कितना धैर्य रखा 
और मुझे मेरी गलतियों से सीखने के लिए
देते रही पूरी पूरी स्वतंत्रता

शायद ये जानते हो तुम
बहुत अच्छी तरह
की 
जो कल्याणकारी है
वह थोपता नहीं स्वयं को
किसी पर

आलिंगन मुक्ति का करें
या बंधन का स्वांग भरें
यह
स्वतंत्रता सौंप कर हमें
अनंत करता है प्रतीक्षा हमारे भीतर

 
और 
एक क्षण
कई कई सीढ़ियों की
रोमांचक, प्रफुल्लित चढ़ाई के बाद
जब आलिंगनबद्ध होने को हूँ
जब अनंत से
कृतज्ञता से याद किया है तुम्हें
और 
देखता हूँ
अनंत ही तुम्हारे रूप में 
दिखाता रहा मुझे यह अंतर यात्रा का पावन पथ 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
            बुधवार, २० अप्रैल २०११                  

प्रखर दीप ने पथ दर्शाया


 
प्रखर दीप ने पथ दर्शाया
गिर जाने से मुझे बचाया
कृतज्ञता से भर कर मैंने
नैनों से आभार जताया
लगा कोइ लौ में मुस्काया
मुझ पर अपना प्रेम दिखाया
कहा, धन्य हो तुम भी प्यारे
तेज़ हवा से मुझे बचाया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० अप्रैल २०११  

 



 
झे      

Tuesday, April 19, 2011

एक निरंतर उपलब्धि




उसने सूरज से अनुमति लेकर
उँडेल दिया
सुनहरा उजियारा
मन की धरती पर

प्रकट हुआ
कालातीत का
अप्रतिम सौंदर्य

वह एक सूक्ष्म प्रदीप्त पुंज
करूणा का
फैलने लगा है
ऐसा बोध भी न हुआ
बस उसके विस्तार में 
मिटता गया भेद
खोने और पाने का
उपलब्ध हो गयी
एक निरंतर उपलब्धि

शेष हो गया 
रुकने और चलने का भेद
स्थिर गति के आल्हाद में
लीन होकर
जब लुप्त हुआ मैं
मेरा  मिटना पूर्ण हो जाना कहलाया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १९ अप्रैल २०११   
            

Monday, April 18, 2011

गीत जो हरदम तेरा



एक लय के साथ बह ले बन के धारा
सांस की उद्गम स्थली ने है पुकारा
छोड़ कर देखो, सभी कुछ है हमारा
पकड़ने की जिद लिए, हर एक हारा

देख स्वागत में खड़ा शाश्वत बुलाये
छूट कर 'मैं' से ही उसको देख पाए
सिमटने का खेल तज, विस्तार पा ले
गीत जो हरदम तेरा, वो गीत गा ले

छल की गलियों में नहीं होगा गुजारा
झूठ के इस खेल में मत फंस दुबारा
खुद को बंदी मान कर मत बन बेचारा
सत्य के संग चल, उसी का है सहारा

देख अब अपना परम वैभव संभल कर
देख दुनिया आस्था के स्वर में ढल कर
 त्याग कर अब अपना खंडित वेश सारा
एक लय के साथ बह ले बन के धरा  


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१८ अप्रैल 2011 
     

Sunday, April 17, 2011

अमृत की बौछार


अब किरणों के नए गीत से
हर धडकना पर प्यार लिखूंगा
हर धड़कन में धड़क रहा जो
मैं उसका आभार लिखूंगा
मौन पिघल 
सुन्दर नदिया बन बहे आज तो
मिला संदेसा
नयन मिला कर,
अमृत की बौछार लिखूंगा

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
  
   

Saturday, April 16, 2011

तुम कौन हो


ऐ जी
तुम कौन हो
उसी एक बात को नया नया कर देते हो
देखने मात्र से सारे संशय हर लेते हो
कैसे संभव हो जाता है तुम्हारे लिए 
हर बार मुझे शुद्ध प्रेम से भर देते हो

ओ मौन सखा
आज फिर तुमने मुझे उबारा
सुन्दर कर दिया संसार सारा
बिना जताए अपनी उपस्थिति
दे दिया मुझे फिर सहारा


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ अप्रैल 2011 

Friday, April 15, 2011

परम विश्रांति का स्वाद



उसने कहा था
सांसों की लहर 
धो रही है
सारी उद्विग्नता

उंडेल रही है
अनिर्वचनीय आभा

उसने कहा था
तुम शांति हो
तुम आनंद का उच्छलन हो
उसकी आश्वस्ति के स्पर्श ने
मुझे आलोकित शून्य में
बिठाया 
और 
चिर नूतन की रसमयी संनिद्धि 
का मधुर साक्षी बनाया

वह लौट गया
मुझे मुझसे मिलवा कर

और मैं
लौटता हूँ उससे मिलने
उन क्षणों तक
जहाँ मेरे लिए
सुलभ होता है परम विश्रांति का स्वाद


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ अप्रैल २०११   


         
  

Thursday, April 14, 2011

उसी के होने की गाथा





एक पूरी कविता
लिख कर मिटा देने के पीछे
निर्णय करने वाला
जो एक सूक्ष्म तंतु है
उसके प्रति विद्रोह नहीं
सम्मान सा ही है
 
यह एक
अनदेखा, सूक्ष्म संकेत देने वाला
मुझमें रह कर
मुझे चलाता है
मेरा रूप
लेकर, जगत के रसमय
स्वरुप को
अपनाता है
 
 
यह एक
जिसके हाव-भाव 
बनाते हैं
जीवन की परिभाषा
इसी को लेकर
फिसलन में भी
बनी रहती है आशा 
 
एक यह
जो हर बार
गिरने से बचाता है
जिसको लेकर
साँसों में शाश्वत सूरज
उग आता है
इसे पहचानने के प्रयास में
जीवन
रसमय होता जाता है
अच्छा लगता है,
जब ये समझ आता है
की मेरा जीवन भी
उसी के होने की गाथा है
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ अप्रैल 2011  

   
 
   

Wednesday, April 13, 2011

आकार के वस्त्र



मन जागता है
कभी कभी इतना अधिक
की
चकमक चांदनी की चकाचौंध
ठहर जाती है
चेतना पर

विलुप्त हो जाती
परिचय को परिभाषित करती
परिधि

सन्दर्भ रहित उपस्थिति की
यह यात्रा
और अधिक सुरमय बना देती 
साँसों को

मन जागता है
कभी कभी इतना अधिक
की जैसे इन्द्रियों से परे
कर रहा हो प्रवेश
सीमातीत लोक में

देख कर मन को 
अंतरहित उपस्थिति में घुलते हुए
एक विस्तृत मौन में लीन
कहने-सुनने से परे
आत्मसात करते हुए बोध विराट का

एक कुछ 
जो रोक कर मुझे फिर से
आकार के वस्त्र पहना देता है
वह चाहता है मैं
अभी कुछ और वसंत देखूं 
और
नव कुसुमो से लदी डालियों को झूमता देख कर
उसकी आराधना के गीत का छंद बनता जाऊं 
   


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अप्रैल २०११
        

दादी के चश्मे से







1
बुरी नज़र लगने की बात
मुझे कभी पचती नहीं है
नकारात्मक भी है कहीं कुछ
ये बात जचती नहीं है



       शायद मेरी समझ
उसी डगर पर
देखती है जीवन
जहाँ आनंद है
विस्तार है
प्यार है
सबके द्वारा
सबके लिए
हितमय व्यवहार है
 


शायद अब तक
दादी माँ की उस बात से मेरा निर्वाह होता है
कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है

'अच्छा' कई बार, हमारी समझ के घेरे में नहीं समाता
जब जो होता है, उसमें 'अच्छा' देखना, संभव नहीं हो पाता  

'अच्छे-बुरे' के प्रभाव में हमारी दृष्टि का भी योगदान है
दादी की सीख में, इस बात की पक्की पहचान है

दादी के चश्मे से मुझे दुनिया ऐसे दिखाई दे जाती है
कि सबके कल्याण की भावना सहज ही उभर आती है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अप्रैल 2011 

 

Tuesday, April 12, 2011

कोई एक भावसूत्र लेकर


इस बार
उसके आने की आहट सुन कर भी
मैंने खोली नहीं आँखें

शायद वो ही हो
शायद वो नहीं हो, सिर्फ भ्रम हो

पर कोई एक भावसूत्र लेकर
मैं
खेलने लगा उससे संबोधित होने का खेल
'इस बार नहीं देखना है तुम्हें'
'तुम आते हो
दिखते हो
सब कुछ दिखाते हो
और फिर खुद छुप कर
जो जो दिखाया 
वो सब सच
मेरे लिए झूठ कर जाते हो
अब इस तरह सताते हो
बैचेनी बढाते हो
कभी सहारा देते हो हर बात का
कभी बेसहारा कर जाते हो

कभी सार जगाते हो हर क्षण में
कभी सब कुछ अर्थहीन कर जाते हो'

कुछ देर चुप रहा
सुनता रहा उसकी संभावित प्रतिक्रिया

शब्द नहीं उसका मौन ही था

उसमें करूणा भी थी
और सत्य की वही तरंग थी
जिसे पकड़ न पाने की छटपटाहट से
व्यथित था

अगर वो बोलता तो शायद ये कहता
"क्या करूँ
नियम है
मुझे वही पकड कर रख सकता है
जो मेरे जैसा बन जाए
और फिर
प्रश्न 'पकड़ने या छोड़ने' का नहीं
'होने' का ही शेष रह जाता है

जब तक तुम
वह न हुए जो 'हो'
तब तक
मेरा-तुम्हारा साथ
ऐसा ही रहेगा
'होकर भी कभी कभी होगा नहीं
न होकर भी होगा ही  हमेशा"

मौन में 
उसकी हंसी सुनकर मुस्कुराया
आंख खोली तो 
खिड़की से निश्छल, कोमल 
उजियारा भीतर आया
 
         अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १२ अप्रैल 2011 

Monday, April 11, 2011

बाहरी दौलत के बदले


 1
दिन है, पर कोई लिहाफ सा ओढ़े है
किरणों का रथ जाने कैसे दौड़े है


बस जल्दी जल्दी
उसने निकाल कर रख दिए
काउंटर पर सारे
बेशकीमती आभूषण
और
मुक्ति की मांग के साथ
जब देखा दाता को

हंस कर कहा देने वाले ने
जब तक
सबसे अधिक मूल्यवान
स्वयं को 
नहीं सौपोगे यहाँ
मुक्ति नहीं
मुक्ति की परछाई ही
मिल सकेगी
सारी की सारी
बाहरी दौलत के बदले


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, ११ अप्रैल ११   

              

Sunday, April 10, 2011

जीवन-मृत्यु के पार


बस धीरे धीरे
पुकार की श्रंखला का
हो ही जाता है असर,
एक दिन माँ 
 अनछुए उजियारे से
 भर देती है घर

कण कण में जाग्रत हो जाते
मधुर आश्वस्ति के
दुर्लभ स्पंदन,
संशयों से छूट कर
शुद्धि में 
निखर जाता मन 

फिर 
एक हो जाते
प्यार, पुकार और
अनंत का सत्कार, 
ऐसे 
एक मंगलमय ज्योत्स्ना 
कर देती
जीवन-मृत्यु के पार 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० अप्रैल 2011 

  

Saturday, April 9, 2011

उदारता का अपार आकाश


और फिर 
यूँ लगा सब कुछ 
देख रहा हूँ नए सिरे से

हर बात के लिए
समझ का नया परिधान
भेजा है किसी ने
जैसे राज महल तक
हीरे मोती भरे थाल माथे पर धरे
आ गए हों
दूत किसी ऐश्वर्यवान के

समझ नए वस्त्र पहन कर
निखर गयी
अनुभूति तक पहुच गयी
अद्वितीय शांति

उदारता का अपार आकाश
हो गया जाग्रत

सहज हो गया
सबके लिए
क्षमाशीलता का परम सुखदाई भाव 

स्व-राजमहल के शिखर से
समझ के नूतन परिधान दाता को देखने के प्रयास में
दिखाई दे गया
सूर्यकिरण में झिलमिलाता
एक रूप
अनंत का


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९ अप्रैल २०११    

Friday, April 8, 2011

कृतज्ञता से भर कर


यह जो
बंद घरों के बाहर
बिना किसी के देखे
धीरे धीरे
उतर आता है
फ़ैलता है बिना किसी को जताए
अपने आने के लिए
किसी विशेष स्वागत की अपेक्षा किये बिना
करता है स्वागत
खिड़की और द्वार खोल कर देखने वाले का
अपनी आश्वस्त करती 
अद्भुत उपस्थिति से

यह
यही उजियारा
दिनकर का विस्तृत उपहार

किसी निर्मल क्षण में
कृतज्ञता से भर कर
सृजनात्मकता, शक्ति, सौंदर्य और श्रद्धा के इस कोष को
रोम-रोम से करता हूँ नमन
सांस सांस से जुड़ जाता हूँ
इस विराट व्यवस्था के अपार सूत्र से
और
अपने सीमित संदर्भों के घेरे से
छूट जाता हूँ
अनायास

हर दिन
सुलभ करवाता है
मुक्ति की अनुभूति 
वाह! क्या बात है 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
८ अप्रैल २०११  


         

Thursday, April 7, 2011

जिन्हें हम कभी नहीं जान पाते हैं



बात शुरू करने के पहले
कोइ एक सिरा
ढूंढता है 
हर कोई

कभी सजगता से
कभी बिना सोचे

कोई एक सूक्ष्म तरंग
साथ चलते हुए
देती है शब्द, भाव, विचार, सपने

बिरला ही करता है प्रयोग करता
चयन की शक्ति का 

और 
जो बहुत सतर्कता से
करने लगता है अभ्यास
चुन कर सर्वश्रेष्ठ को
अपनाने का
बस उसी को गाने का

अक्सर
वह मौन हो जाता है

फिर एक ऐसा क्षण आता है
जब चुनने का भाव भी छूट जाता है
वह क्षण
जब
चुनने वाला और चुना गया एक हो जाते हैं

तब
वे उन लहरों के
उद्गम हो जाते हैं
जिनसे जग में सुन्दरता और
सार के दरसन हो जाते हैं

अक्सर वे लोग
जिन्हें हम कभी नहीं जान पाते हैं
हमारे लिए सार के संकेत और गति सुलभ करवाते हैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
            गुरुवार, ७ अप्रैल 2011           

Wednesday, April 6, 2011

कोई अदृश्य हाथ हर दीवार हटाये




एक क्षण
जब कोई खिड़की से परदा हटाये
कमरे में उजियारा लहलहाए
समय ही मधुर राग छेड़ कर
साँसों में मधुर संगीत सजाये

एक क्षण
तुम्हारे होने की आभा खिल जाए
खोया परिचय अमृत का मिल जाए
आनंद के झरने में भीग कर उड़ता
सनातन श्वेत पंछी आशीष लुटाये

एक क्षण
सम्पूर्णता का वैभव दिख जाए
कुछ 'न होने' की कसक बिसर जाए
तन्मयता की तान ऐसे ठहरे साथ में
कि प्रेम का अक्षय स्त्रोत मुस्काये

एक क्षण
कोई अदृश्य हाथ हर दीवार हटाये
वही विस्तार हम सबको अपनाए
शून्य ले जाए भेद मेरे-तेरे का
शुद्ध तृप्ति सहज ही  उमड़ आये
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ६ अप्रैल 2011  

  
 
    

Tuesday, April 5, 2011

सबके साथ, सहज अपनापन


भाव शुद्ध हो
कर्म हो उज्जवल
गहरे ठहरे
यह मन चंचल
ध्यान केंद्र पर
रहे निरंतर
प्रेम प्रकाश
बढ़ाये हर पल
 
 
अब उलझन के पार निकल ले
अपना जीवन, आप बदल  ले
रस्ते की फिसलन बोले है
निकल सकेगा, जरा संभल ले
 
 
माँ के आने की तैय्यारी
जिससे है ये सृष्टि सारी
वो सबकी, पर कोई-कोई ही
उसकी ममता का अधिकारी
 
 
फिर से करूँ पुकार प्यार से
मुझको फिर तू मिला सार से
बता शांत रह पाऊँ कैसे
मिलना हो जब अहंकार से

 
मगन प्रेम में तेरे साईं
सारा जग, तेरी परछाई
तुझको देखा, जादू जागा
अपनी बस्ती, बहुत सुहाई
 

उभर गया फिर गान सनातन
निखर गया शाश्वत से आँगन
  परम शांति का बोध उजागर 
सबके साथ, सहज अपनापन
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ५ अप्रैल 2011    
 

    
   
   

             

Monday, April 4, 2011

दूर कर नाराजगी सूरज की



कभी कभी कविता दर्द से आती है
पर अक्सर, कविता दर्द मिटाती है
परत दर परत जब हटती जाती है
एक शुद्ध कविता शेष रह जाती है 

 कहने वाले में
 अब तक
शेष है 'आस्था' शब्द के प्रति
मानवता के प्रति

इसीलिए मुझे
उसका कहना
अच्छा लगता है

लगता है उसके शब्द
दूर कर नाराजगी सूरज की
बुला ही लायेंगे उसे

ना जाने कबसे
उतरा ही नहीं है
बस्ती में उजाला    
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ अप्रैल २०११  


  

Sunday, April 3, 2011

उजियारे से आँख चुराना


 
उसने पाया, जिसने जाना
जीवन है अनमोल ख़ज़ाना
 
ठहर ठहर कर ही दिखता है
लगा हुआ है आना-जाना

नदी किनारे मिल जाता है
कुछ यादों का ताना-बाना
 
 पलट पलट कर देखें कब तक
अच्छा है, आगे बढ़ जाना
 
पूछ-ताछ के बिना खिले जो
होता है सुन्दर अफसाना  
 
मेरा काम,  आवाज़ लगाना
उस पर है, आना ना आना 
 
अब जाकर छूटा है मुझसे
उजियारे से आँख चुराना
 
द्वार खोल कर रख छोड़ा है
जब भी चाहो, तुम आ जाना
 
धारा का तो खेल यही है
पत्थर को यूँ गढ़ते जाना 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
रविवार, ३ अप्रैल २०११   


 
 
 
 
 
 

 


 
 

 

Saturday, April 2, 2011

दर्द बाँटना सरल नहीं है


विस्मय भी होता है चंचल 
हमें छोड़ जाता है हर पल

तरह तरह से भरा है उसने
मैंने जब फैलाया आँचल

पानी और अधिक पावन था
जब जाना ये है गंगाजल

सन्दर्भों में शीतलता है
और कभी जागे दावानल

उसने नहीं कहा था कुछ भी
पर मैंने तो पाया संबल

पहले हम उससे डरते थे
अब हमसे डरता है जंगल

अब वो बात फूल लगती है
जिस पर हो जाता था दंगल

अपनेपन का किस्सा लेकर
आँगन आँगन बरसे  बादल

 दर्द बाँटना सरल नहीं है
एक नहीं, दोनों हैं घायल   


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ अप्रैल २०११  

  

Friday, April 1, 2011

विराट का सहज निवास


वह
जो 
कहता-सुनता है
उसे लेकर
उसके आगे 
एक विराम की विश्रांति 
पाकर
मौन की अनछुई मधुरता लेकर
लौटा
वह

    और उसकी लबालब करूणा ने
छू लिया मुझे

इस स्पर्श की कांति में दमकता
महसूस करता
अपनी मुस्कान में
विराट का सहज निवास


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ अप्रैल २०११

(यह कविता स्वामी श्री ईश्वारानंद गिरिजी महाराज की पुस्तक 
'आनंद मीमांसा' के पुनः पढ़ते हुए 
अनावृत होती स्पष्ट को पकड़ने के प्रयास की अभिव्यक्ति )       

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...