Thursday, April 28, 2011

ये जो भीतर का साम्राज्य है



हम एक दुसरे के हिस्से का
सुख-दुःख
बाँट सकते है
कुछ हद तक
पर कोई किसी का हाथ
पकड़ कर
नहीं ले जा सकता
सरहद तक



ये भी उसका विधान है
की वैसे रास्ता आसान है
पर किसी न किसी बात पर
हर तरफ घमासान है   

पार जाने की ललक
जब तक भीतर से नहीं आती
सारी सुविधाएँ
और अनुकूलता धरी रह जाती

ये जो भीतर का साम्राज्य है
यहाँ बैठ कर कोई हमें नित्य छलता है
और वो इतना चतुर है की
ठग लिए जाने का पता भी नहीं चलता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२८ अप्रैल २०११   

 

 

         

3 comments:

anupama's sukrity ! said...

पार जाने की ललक
जब तक भीतर से नहीं आती
सारी सुविधाएँ
और अनुकूलता धरी रह जाती


भीतर का साम्राज्य बहुत प्रबल है ..!!

प्रवीण पाण्डेय said...

उससे होती, नित्य लड़ाई।

Ashok Vyas said...

sahee baat hai praveen Bhaee

Bheetar ke samrajya kee prabalta pehchaanne ke liye naman Anupamajee

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...