Wednesday, April 13, 2011

दादी के चश्मे से







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बुरी नज़र लगने की बात
मुझे कभी पचती नहीं है
नकारात्मक भी है कहीं कुछ
ये बात जचती नहीं है



       शायद मेरी समझ
उसी डगर पर
देखती है जीवन
जहाँ आनंद है
विस्तार है
प्यार है
सबके द्वारा
सबके लिए
हितमय व्यवहार है
 


शायद अब तक
दादी माँ की उस बात से मेरा निर्वाह होता है
कि जो होता है, अच्छे के लिए होता है

'अच्छा' कई बार, हमारी समझ के घेरे में नहीं समाता
जब जो होता है, उसमें 'अच्छा' देखना, संभव नहीं हो पाता  

'अच्छे-बुरे' के प्रभाव में हमारी दृष्टि का भी योगदान है
दादी की सीख में, इस बात की पक्की पहचान है

दादी के चश्मे से मुझे दुनिया ऐसे दिखाई दे जाती है
कि सबके कल्याण की भावना सहज ही उभर आती है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अप्रैल 2011 

 

2 comments:

anupama's sukrity ! said...

दादी के चश्मे से मुझे दुनिया ऐसे दिखाई दे जाती है
कि सबके कल्याण की भावना सहज ही उभर आती है

sunder soch.

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह, सबकी दृष्टि ऐसे ही परिपक्व हो जाये।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...