Wednesday, April 13, 2011

आकार के वस्त्र



मन जागता है
कभी कभी इतना अधिक
की
चकमक चांदनी की चकाचौंध
ठहर जाती है
चेतना पर

विलुप्त हो जाती
परिचय को परिभाषित करती
परिधि

सन्दर्भ रहित उपस्थिति की
यह यात्रा
और अधिक सुरमय बना देती 
साँसों को

मन जागता है
कभी कभी इतना अधिक
की जैसे इन्द्रियों से परे
कर रहा हो प्रवेश
सीमातीत लोक में

देख कर मन को 
अंतरहित उपस्थिति में घुलते हुए
एक विस्तृत मौन में लीन
कहने-सुनने से परे
आत्मसात करते हुए बोध विराट का

एक कुछ 
जो रोक कर मुझे फिर से
आकार के वस्त्र पहना देता है
वह चाहता है मैं
अभी कुछ और वसंत देखूं 
और
नव कुसुमो से लदी डालियों को झूमता देख कर
उसकी आराधना के गीत का छंद बनता जाऊं 
   


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ अप्रैल २०११
        

5 comments:

anupama's sukrity ! said...

नव कुसुमो से लदी डालियों को झूमता देख कर
उसकी आराधना के गीत का छंद बनता जाऊं

sunder abhivyakti .

वन्दना said...

वाह्……………इस रचना मे तो गूंगे के गुड सा स्वाद है।

प्रवीण पाण्डेय said...

सुन्दर पंक्ति-हार।

Swarajya karun said...

चेतना पर चकमक चांदनी की चकाचौंध का ठहर जाना - मन को छू गया . आभार .

Ashok Vyas said...

अनुपमाजी आपकी प्रतिक्रिया है अनुपम

वंदनाजी आपकी संवेदनशीलता का वंदन

प्रवीणजी आप तो बहु आयामी विधाओं में प्रवीण हैं

स्वराज्य जी आपकी करूणा का स्पर्श मिलता रहे

सबको धन्यवाद

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