Thursday, April 14, 2011

उसी के होने की गाथा





एक पूरी कविता
लिख कर मिटा देने के पीछे
निर्णय करने वाला
जो एक सूक्ष्म तंतु है
उसके प्रति विद्रोह नहीं
सम्मान सा ही है
 
यह एक
अनदेखा, सूक्ष्म संकेत देने वाला
मुझमें रह कर
मुझे चलाता है
मेरा रूप
लेकर, जगत के रसमय
स्वरुप को
अपनाता है
 
 
यह एक
जिसके हाव-भाव 
बनाते हैं
जीवन की परिभाषा
इसी को लेकर
फिसलन में भी
बनी रहती है आशा 
 
एक यह
जो हर बार
गिरने से बचाता है
जिसको लेकर
साँसों में शाश्वत सूरज
उग आता है
इसे पहचानने के प्रयास में
जीवन
रसमय होता जाता है
अच्छा लगता है,
जब ये समझ आता है
की मेरा जीवन भी
उसी के होने की गाथा है
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ अप्रैल 2011  

   
 
   

2 comments:

anupama's sukrity ! said...

यह एकअनदेखा, सूक्ष्म संकेत देने वालामुझमें रह करमुझे चलाता हैमेरा रूपलेकर, जगत के रसमयस्वरुप कोअपनाता है यह एकजिसके हाव-भाव बनाते हैंजीवन......

अब सौंप दिया इस जीवन का सब भार तुम्हारे हाथों में ......
sunder rachna .....

प्रवीण पाण्डेय said...

न जाने कितने निर्णय उसी का प्रतिबिम्ब है।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...