Tuesday, April 19, 2011

एक निरंतर उपलब्धि




उसने सूरज से अनुमति लेकर
उँडेल दिया
सुनहरा उजियारा
मन की धरती पर

प्रकट हुआ
कालातीत का
अप्रतिम सौंदर्य

वह एक सूक्ष्म प्रदीप्त पुंज
करूणा का
फैलने लगा है
ऐसा बोध भी न हुआ
बस उसके विस्तार में 
मिटता गया भेद
खोने और पाने का
उपलब्ध हो गयी
एक निरंतर उपलब्धि

शेष हो गया 
रुकने और चलने का भेद
स्थिर गति के आल्हाद में
लीन होकर
जब लुप्त हुआ मैं
मेरा  मिटना पूर्ण हो जाना कहलाया

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १९ अप्रैल २०११   
            

2 comments:

anupama's sukrity ! said...

प्रकट हुआ
कालातीत का
अप्रतिम सौंदर्य

saundaryapoorna abhivyakti ....!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुन्दर

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