Saturday, April 23, 2011

विराट के नाम करते रहो पुकार


अब हर दिन
उसकी दृष्टि से देखते हुए 
संसार को
बार बार मुझ पर खुलती है 
ये बात
की मैंने कितना कम देखा
मैंने कितना कम जाना

और
अपने हाथों लगाई गयी
कुछ कुछ गांठों को खोलते हुए
हर दिन
अपने बंधन से 
थोडा थोडा मुक्त होता हूँ     


अब हर दिन
तुम्हें जानने की कोशिश में

विस्मित होता हूँ
कैसे निरंतर
एक चलचित्र की तरह
दीखता रहा है संसार तुम्हें
और
कितनी सारी परतों का परिचय
                                                             तुम्हारी आत्मीय विश्लेषण से
होता रहा है उजागर

शायद कालातीत की संनिद्धि में
सहज हो जाता है
तुम्हारे साथ समय के इतने सारे आयामों  को
एक साथ देख पाना


किसी निश्छल क्षण में
ये बोध भी
खुला है मुझ पर
की तुम आदि-अंत रहित उपस्थिति के
उल्लास की तान में
जिसका गौरव गान करते रहे हो
वह प्रकट होना चाहता रहा है मेरे द्वारा भी
और
मैं उसका रास्ता रोके हूँ
और वह अपार शक्ति का स्वामी
मुझ अकिंचन का इतना सम्मान करता है
की बनाये रखता है 
मेरी स्वतंत्रता 
पर क्या ये ठीक है
की स्वतंत्रता के नाम पर
मैं सीमित और क्षुद्र बना रहूँ
और
वो चुपचाप देखता रहे


फिर फिर मुझे लगता है
तुम मुस्कुरा कर
परीक्षा में संकेत देते साथी की तरह
स्मृति धारा में बार बार आते हो
और 
अपने सौम्य मौन में मुझे बताते हो
सहजता से शिकायतों की गांठें खोल जाते हो
कहते हो, स्वतंत्रता का ठीक-ठीक उपयोग करो
अपने उत्थान के लिए इस सनातन शक्ति का प्रयोग करो

विराट के नाम करते रहो पुकार
कहो, प्रस्तुत हूँ, छोड़ क्षुद्रता, अपनाने विस्तार
कहो, अनुमति ही नहीं, आग्रह भी है अनंत
मानव बनाया, धन्यवाद, अब करो मेरा उद्धार   
   
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, २३ अप्रैल २०११  

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

विराटता से ही क्षुद्रतायें जीती जा सकेंगी।

anupama's sukrity ! said...

कहो, प्रस्तुत हूँ, छोड़ क्षुद्रता, अपनाने विस्तार
कहो, अनुमति ही नहीं, आग्रह भी है अनंत
मानव बनाया, धन्यवाद, अब करो मेरा उद्धार

नत मस्तक हूँ प्रभु तुम्हारे द्वारे ...
सांझ सकारे ....
तू ही अब उबारे ...

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...