Wednesday, April 6, 2011

कोई अदृश्य हाथ हर दीवार हटाये




एक क्षण
जब कोई खिड़की से परदा हटाये
कमरे में उजियारा लहलहाए
समय ही मधुर राग छेड़ कर
साँसों में मधुर संगीत सजाये

एक क्षण
तुम्हारे होने की आभा खिल जाए
खोया परिचय अमृत का मिल जाए
आनंद के झरने में भीग कर उड़ता
सनातन श्वेत पंछी आशीष लुटाये

एक क्षण
सम्पूर्णता का वैभव दिख जाए
कुछ 'न होने' की कसक बिसर जाए
तन्मयता की तान ऐसे ठहरे साथ में
कि प्रेम का अक्षय स्त्रोत मुस्काये

एक क्षण
कोई अदृश्य हाथ हर दीवार हटाये
वही विस्तार हम सबको अपनाए
शून्य ले जाए भेद मेरे-तेरे का
शुद्ध तृप्ति सहज ही  उमड़ आये
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ६ अप्रैल 2011  

  
 
    

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

एक क्षण में व्यक्त हो जाता है सदियों का अनुभव।

anupama's sukrity ! said...

एक क्षणसम्पूर्णता का वैभव दिख जाएकुछ 'न होने' की कसक बिसर जाएतन्मयता की तान ऐसे ठहरे साथ मेंकि प्रेम का अक्षय स्त्रोत मुस्काये


स्वर्गिक प्रतीति ...
ओस की एक बूँद सी ....
तृप्त करती हुई अनुभूति ......
आभार .

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...