Sunday, October 31, 2010

बात मेरी ना थी, ना है कोई

 
1
कहीं अपना लगता है, कहीं पराया
सयाने लोग इसी को कहते हैं माया

कहते हैं अजन्मा का वास है सबमें
पर जन्म-मृत्यु से कौन बच पाया
 
२ 
 
 गीत साँसों के साथ जो आया
सार जीवन का अपने संग लाया

रस्ता तन्हाईयों का था लेकिन 
वो हर एक मोड़ पर नज़र आया
 
उड़ गए ख्वाब सब हथेली से
मगर धड़कन को तूने अपनाया 
 
दिशा तारे बताएं सदियों से
बढ़ा संकेत से जो बढ़ पाया 
 
बात मेरी ना थी, ना है कोई
जिसकी है, उसका नाम ही गाया
 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३१ अक्टूबर २०१०




 वो हर बार नज़र आया






Saturday, October 30, 2010

वही मिल जाता है

 
कभी कभी
बहुत महत्वपूर्ण होती है
ये बात
कि कहाँ क्या है
पर एक कुछ अप्रभावित रहता इससे 
मीरा महल में हों या नगर की गलियों में
लय मीरा के मन की
सधी रही कान्हा तक हमेशा


एक वह 
जो अप्रभावित है सबसे
किस तरह प्रभावित कर देता सब कुछ
सोचने लगें तो
सोच छूट जाती है
वही मिल जाता है
जो है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

Friday, October 29, 2010

बदलाव

                                                         (चित्र- ललित शाह)

 
बदलाव
एक वह जो होता है
एक वह जो किया जाता है
बदलाव
एक वह जो 'करने' और 'होने' वाले बदलाव के सम्बन्ध को
बदल बदल कर
झांकता है
हमारे जीवन से,
कभी उत्साह के शिखर तक ले जाता
कभी उदासीनता की गुफा तक पहुंचाता

बदलाव को जिसके आधार से
मिलता है रूप अपना
उस आधार को
पकड़ने के प्रयास में
बार बार
बदल जाता हूँ मैं
और 
इस प्रक्रिया में
कभी तुम्हे बहुत समीप पाता हूँ
पर कभी कभी
तुम्हें पहचान ही नहीं पाता हूँ

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

Thursday, October 28, 2010

कृतज्ञता से भर कर



 
इतिहास के लिए नहीं 
पर
इतिहास से जीता हूँ मैं 
जाने-अनजाने
अतीत के संकेत
देते हैं दिशा निर्देश
मेरी निर्माण प्रक्रिया में
शामिल है
बहुत कुछ ऐसा
जो हो चुका था घटित
मेरे प्रकट होने से पहले
किसी एक
सूक्ष्म संवेदनात्मक क्षण में
सहसा
कृतज्ञता से भर कर
याद करता
उन सबको
जिन्होंने किया अनुसंधान सत्य पर
वह सत्य 
जो उनके साथ भी वैसे ही
सम्बंधित था
जैसे मुझसे है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

Wednesday, October 27, 2010

मैं अब तक पारदर्शी हूँ

 
यहाँ
कई रंगों के झंडे हैं
एक वो भी रंग है
जिसमें सब समा जाते हैं
एक वो भी
जिससे सब घबरा जाते हैं

मैं अब तक
पारदर्शी हूँ
 कोई भी रंग
मुझ पर ठहरता नहीं 
इस तरह रंगमुक्त या रंगहीन होना
मेरे लिए
वरदान है या अभिशाप?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका


Monday, October 25, 2010

मौन की शरण

                                                                                (चित्र - ललित शाह )

जहाँ ऐसी अभिव्यक्ति हो
कि संवेदना पर हथोडा सा बजने लगे
वहां जाने से कतराता हूँ,
जहाँ मुखरित होकर ऐसा लगे
कि मैं अपने आपको 
ज्वलनशील बारूद बनाता हूँ,
वहां मौन की शरण लेकर
सुरक्षित, समन्वित धरती पर
लौट आता हूँ
क्या करूँ इसका, कि अपनी इस आदत 
के कारण कभी पलायनवादी
कभी कायर कहलाता हूँ?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका

Saturday, October 23, 2010

जोड़-तोड़ से परे का गणित

 
अब हालात के नाम
नहीं लगा सकते 
अपनी जिम्मेवारी का नया पोस्टर
सजाना है स्वजनित उत्साह से
सपनो का नया घर

बुनावट इस घरोंदे की
मांगती है
स्पर्श तुम्हारी आत्मा का,
समीकरण संबंधों का
फिर सिखा रहा है
जोड़-तोड़ से परे का गणित,

जितना जितना 
अपेक्षाओं की डोर को ढीला करते जाओगे 
पतंग प्यार की
नयी ऊंचाईयों तक पहुँचाओगे 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका

Thursday, October 21, 2010

बस एक क्षण ऐसा



 
बस एक मुस्कान
बस एक थपकी
बस उत्साह बढाता एक वाक्य
बस एक नई किरण आशा की
बस एक प्यार की ललक बढ़ाती दृष्टि 
 
बस एक क्षण ऐसा 
जब फिसलते फिसलते 
संभल कर 
फिर से कर लें 
आलिंगन उस सपने का 
जिससे 
जीवन जीवन बनता है 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

Wednesday, October 20, 2010

विस्तृत मौन की मधुरिमा में




 
इस बार
कहीं से भी
ढूंढ कर लानी है
वह मणि
जिसकी चमक से
यह 'एकाकीपन' का श्राप धुल जाए

शपथ लेकर
नई नवेली ओस की बूँद की
किरणों के सागर में
साँसों का सार लेकर
उतरा वह
असीम का आव्हान कर
 
और 
हो रहा विलीन
उसी चमक में
जिसे बिखेरती थी
सहज पावनता प्रसरित करती
एक मणि

विस्तृत मौन की मधुरिमा में
लहराया एक 'बोध'
भेद नहीं है 
सर्वोत्तम को 'पाने' और 'स्व के खो जाने में'
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका


Tuesday, October 19, 2010

यह आत्मीय उपहार मेरा


 
चलो समेट कर किरणें
चल दिया सूरज
अज्ञात स्थल को
फिर एक बार,
 
सांझ के साथ
उतरते अँधेरे में पर
ठहरी है
झंकार आनंद की 
थिरकता है
संभावनाओं का नया गिटार 
अपने आप 
एक मधुर धुन से 
भरते हुए सारा वातावरण,
 
इस क्षण 
अपने ह्रदय में स्थित 
मंगल कामनाओं के नए कोष से 
पहुंचा रहा हूँ 
तुम्हारे द्वार तक 
शुभ भाव
 
जब फुरसत हो
द्वार खोल कर
कल लेना स्वीकार यह आत्मीय उपहार मेरा
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका

Monday, October 18, 2010

प्रमाण सत्य का

 
 
खोजता रहा 
प्रमाण सत्य का
हर दिशा
हर अनुभव में वह

और फिर बरसों बाद
संकेत सत्य का
मिला इतना सा
' खोजो मत
स्वयं ही 
बन जाओ प्रमाण सत्य का
छोड़ कर
अपना सीमित परिचय'


अशोक व्यास
 

Saturday, October 16, 2010

वो मुक्त ही रहते हैं हमेशा

 
कभी कभी
या शायद अक्सर
ऐसा लगता है
जो कुछ करता हूँ मैं
या जो कुछ होता है मुझसे
उसका प्रारंभ
उसकी लय
उसकी पूर्णता
स्वतंत्र है मुझसे

मैं करते हुए भी
करता नहीं
बनता हूँ माध्यम 
उसके होने का
जिसे होना है

 कर्म भी शायद 
कविता की तरह ही है

प्रस्फुटित होता है मुझसे 
अपनी स्वतंत्र गरिमा लिए
मेरे लिए तृप्ति का मधुर उपहार छोड़ता 
घोषित करता है
'मैं भी मुक्त हूँ हमेशा
कर्म से ही नहीं
  कर्म के फल से भी"
बाँध लेता है बस 
कर्तापने का भाव 
जो शायद छल है मेरा ही
तो क्या
जो निश्छल होते हैं 
वो मुक्त ही रहते हैं हमेशा?

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ अक्टूबर २०१०


Friday, October 15, 2010

किरण दे रही दस्तक





जब जब तेरी याद की चादर ओढी है
अपनी हर मुश्किल की चर्चा छोड़ी है
तेरी रहमत में रम जाने की धुन ले 
फुरसत जो भी है, लगता है थोड़ी है


रात उदासी का मंजर था, बीत गया
फिर से उजियारे का पंछी जीत गया
किरण दे रही दस्तक अब घर-द्वारे पर
धड़कन में हो गया अंकुरित गीत नया



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ अक्टूबर २०१०


Thursday, October 14, 2010

paridhi ke paar

लिख लिख कर ये पता चलता है कि स्वतंत्रता की अनुभूति के लिए कोई समय निर्धारित करना ठीक नहीं है
इसलिए कविता लेखन नियम से करने के विचार में एक तरह का विरोधाभास है
पर इस तरह अनुशासित hone का एक swayam ko mil jaata है
अनुशासित hokar apne saath samvaad करने के लिए blog kyoon
diary kyoon नहीं?
इस prashn का uttar ये hee ho sakta है कि
paathak में aur apne में एक  vishisht atmiyta है
aisa maan कर hee yeh blog है

vaise shuru karte समय ये pataa na tha
कि hindi blogs का itna samraddha sansaar aur parivaar internet पर है
kaee baar कविता likhne से milne waale 'atm-santosh' की तरह hee
any bloggers के likhe ko padhne में bhee 'tripti aur ullas' का anubhav hota है
rachnatmakta का prasaad lekhak के saath saath paathak में bheee hota है
mooltaya hamaara srijanatmak 
saathee है vo man, 
jo judne, seekhne aur jaanne के लिए prastut है
aisa man apne anoothe dhang से 
एक vyakti aur doosre vyakti के beech
की 'deevaar' ko mita deta है
aisa man, vistaar की akulahat lekar
chhoo lena chahta है
vo paridhi 
jise ham apne sansaar की seemaa maante hain
aur
shayad इस तरह 
satat vistaaronmukhee man
har 'paridhee के paar' bhee jaa sakta है

astu

Ashok Vyas
nyooyark, amerika
14 aktoobar 2010

Wednesday, October 13, 2010

अनूठी सौगात

भागने के लिए
रास्ता नहीं कोई दूसरा
गंतव्य को नकारना 
नहीं तुम्हारे हाथ

मुड कर देखना 
व्यर्थ है हर तरह से
देखो आगे
निश्चय के साथ
 
मत करो संकोच
प्रकट करते हुए
अपनी स्वछन्द 
आत्मा की बात

धरी ना रह जाए
सुरक्षित है तुममें
सृष्टि के लिए
जो अनूठी सौगात 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 

Tuesday, October 12, 2010

शिखर की मुस्कान

 
धक्का दे देकर
उसे रस्ते से हट जाने के लिए
उकसाता रहा कोई
उसकी जमा पूंजी को
नकली नकदी कह कर उसे
दरिद्र बताता रहा कोई

और
वो भी सोचने लगा था
क्या
पंक्ति से हट जाए
शिखर तक
पहुँचने की
चाहत से पलट जाए

पर तभी
शिखर की मुस्कान से
छू गया अपना आप
फूट गया
 रोम रोम से
गति का सहज आलाप


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ अक्टूबर २०१०

Monday, October 11, 2010

दिन उजला है


दिन आकर खड़ा हो गया था द्वार पर
बिना कहे
कह रहा था
खोलो दरवाज़ा
गले मिलो मुझसे

दिन मुझसे कुछ लेता नहीं
देता ही है
मुझे अपना आप
नई नई तरह से 

दिन उजला है
अवसरों से लबालब भरा है

कर रहा है प्रतीक्षा 
                                                                   एक आत्मीय आलिंगन की

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ अक्टूबर 2010

Sunday, October 10, 2010

धीरज के गाँव का पता

 
उसने फिर पूछा
पहाड़ से
धीरज कहाँ से लाऊँ
मंद मंद
मुस्कुरा कर
बताने को था
मौन तोड़ कर पर्वत कि
धीरज का रास्ता मिलेगा
साँसों के मध्य स्थित विराम में
धडकनों की लय में विराजित आराम में
 
पर उसी क्षण 
अधीरता में अपनी
चल पडा वह
पर्वत से निराश होकर  
किसी ओर से
धीरज के गाँव का पता पूछने


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० अक्टूबर 2010

Saturday, October 9, 2010

अव्यक्त प्यास


शहर के उस हिस्से में
जहाँ रोशनी रहती है
अपने लिए
एक मकान लेने की ख्वाशिश
अब तक
उसकी जेब में
फड़फड़ाती है
सिकुडती जा रही हैं 
अब जो दीवारें 
उनके घेरे में
उस तक
खिलखिला कर धूप भी
नहीं आती है 
आज
आँख मल कर
पहाडी मंदिर का झंडा देख 
फिर उसने सोचा 
कैसे तय होता है
कि किस्मत किसको
कौन सा झंडा थमाती है
 
आज फिर
नदी में डुबकी लगा कर
उसने सोचा
हट जायेगी कसमसाहट
पर
एक पपड़ी सी 
अव्यक्त प्यास की 
 चेतना से और
चिपकती जाती है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
९ अक्टूबर २०१०

Friday, October 8, 2010

ना जाने क्या था

 
देर तक
बिसरा रहा
अपना दर्द, आक्रोश, असंतोष 
अनवरत लड़ाई में हार की तल्खी से दूर 
 
ठहर कर
देर तक
देखता रहा
रुके हुए पानी में
हवा की थपथपाहट से
हिलती हुई पत्तियां, आकाश
और किसी अनाम पंछी की उड़ान


ना जाने क्या था 
जो चुप्पी में
सब कुछ सुन्दर और समन्वित करता रहा 
अपने आप 
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
८ अक्टूबर २०१० 

Thursday, October 7, 2010

समझ की नई रोशनी

 
ये क्या
सब कुछ सबको दिखाई देने लगा है अब
और कोई भी
कुछ भी नहीं देखता
 
ये असमंजस का काल 
हमें 
नई तरह से मुक्त करता
और नई तरह से बांधता है
समझ की नई रोशनी लेने
कोई किसी और के द्वार पर
जाने से कतराता है
कभी छले जाने का डर है
कभी अपना ही अहंकार
दीवार बन जाता है
 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
७ अक्टूबर २०१०






Wednesday, October 6, 2010

कहाँ हैं ये सीढियां





 
वो सीढियां
जिन पर चढ़ कर
शिखर की ओर जाते
दिखाई देते लोग

ऊंचाई का स्वाद चखते
मुस्कुराते, आत्म-तुष्टि से हाथ हिलाते
अपने संतोष की पताका फहराते

कौन हैं ये लोग
जो इन अनदेखी सीढ़ियों पर चढ़ते जाते?
कहाँ हैं ये सीढियां
जिनके रास्ते सबको नज़र नहीं आते?

 
किस पर निर्भर है ये कि
हम कब, क्या, कितना देख पाते हैं?
कई बार अपनी सीमित दृष्टि को लेकर 
हम बस खीझते और झल्लाते हैं
और अपने ही भीतर छुपा 
उत्थान का द्वार देख नहीं पाते हैं 
दनादन सीढियां चढ़ते लोग देख-देख 
उपलब्धियों के लिए ललचाते रह जाते 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, ६ अक्टूबर २०१०




Tuesday, October 5, 2010

ये सब जो सहज है





ये सब जो सहज है
ये साँसों का आना-जाना
ये हवा का अनुकूल स्पर्श
ये सूरज की गुनगुनाती किरण
ये स्थिर, सुख के चार पल सजाती छत
ये चार दीवारें 
जिनमें चार लोग मिल कर
संबंधो के राग-रंग का अलंकरण करते हैं 
ये सब जो सहज है
एक साफ़ सुथरी मेज
एक साफ़ सुथरा बिस्तर
डाईनिंग टेबल पर
साथ बैठ कर गरमा गरम भोजन का सेवन

ये सब सहज से संवाद
हल्की-फुल्की बातों पर हँसना
या अपने आप में मगन मुस्कुराना
और 
एक साथ आपसी समझ की नई सीढियां चढ़ना
 
छूट जाती हैं जब ये सहज प्रतीतियाँ 
तब समझ में आता है
ये सब जो सहज है
सामान्य नहीं 
बहुत विशेष है
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
५ अक्टूबर २०१० 
 
 




Monday, October 4, 2010

मैं वही हूँ

 
पुराने दिन
कहीं जाते नहीं हैं 
बैठे रहते हैं
अपनी खुशबू के साथ
बहती नदी के किनारे
और
ये किनारा भी चलता है
साथ-साथ नदी के
 
किसी के रुकने का भ्रम 
जरूरी है
गति का भान बनाए रखने के लिए
बस इसीलिए
रोक दिया है अब
तुम्हारी यादों की रेल का चलना
वैसे
बदलते बदलते भी
सचमुच बदला तो नहीं है
कुछ भी
भीतर किसी
अनाम स्थल के मधुर एकांत में 
मैं वही हूँ


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ अक्टूबर २०१०



Sunday, October 3, 2010

कामना


दबी-छुपी रहती हैं
कुछ कामनाएं
भीतर हमारे
ऐसे की हम भूल से जाते हैं उन्हें
और फिर
किसी अप्रत्याशित क्षण में
प्रकट होकर
बवंडर सा मचा देती हैं
शांत, स्थिर वातावरण में

चाहने या ना चाहने के साथ साथ
चाहने की तीव्रता के भी
तर्क होते हैं
हमारे अपने

पर कभी कभी
वक्त-बेवक्त
कोई जरूरत
बढ़ा कर कद अपना
लहराती है ऐसे
कि उसे हटा कर
कुछ और देख पाना 
असंभव सा हो जाता है


ऐसे में
 तुम्हारी और देख कर
हर कामना से तत्काल मुक्त होने का प्रयास
क्या ठीक है परमपिता?
शायद इस तरह 
संभव हो जाए
ये याद करना कि
हर कामना से
बड़ा हूँ 'मैं' 

अशोक व्यास
शिकागो, अमेरिका
रविवार,३ अक्टूबर २०१० 



Saturday, October 2, 2010

यह नयापन लेकर



वह क्या है
जो अनुभव के रंग
पल भर में
बदल कर
सुन्दर, सुनहरे कर देता है

वह
प्रभाव
एक अपरिभाषेय उपस्थिति का
ह्रदय में
जगा देता है
एक ताप सा
जिससे
मिट जाते सब संताप

यह क्या है
करूणा के सागर सा
बहते बहते
स्वर मात्र से
व्यवस्थित, समन्वित कर देता
मन की उथल-पुथल

इस एक
अनुभूति में
घुल मिल कर
नया सा हो जाता
जीवन सारा,
यह नयापन लेकर
जब
मिल रहा हूँ
तुम्हें,
तुम्हारे लिए
मैं वही पुराना हूँ
पर तुम नए-नए हो गए हो मेरे लिए
अहा!

अशोक व्यास
शिकागो, अमेरिका
२ अक्टूबर २०१०




Friday, October 1, 2010

रुकने और चलने का अंतर

' रुकना नहीं
चलते जाना'
बस इतना ही याद था उसे
जीवन के उस छोर पर
मिला था शायद संकेत यही 

'पहुंचना कहाँ है'
ये ना सोचा था
ना पता था

और एक दिन
चलते चलते
जब अपने गंतव्य के बारे में
सुनिश्चित होने की जिद लेकर बैठ गया वो

तब
धीरे धीरे 
ना जाने कैसे
मिट सा गया
रुकने और चलने का अंतर

रुके रुके भी
वो किसी आश्चर्यजनक ढंग से
निकल सकता था सबके आगे
और
चलते हुए 
उस पर नहीं था अब दबाव 
कहीं पहुँचने का
कुछ बन कर दिखाने का
 
पर उसे मालूम था
'ये भाव भी स्थाई नहीं है'
 
स्थाई शायद वो है
जो 'कड़ी' है 
'रुकने' और 'चलने' के बीच
और
जिसका आधार लेकर
संभव हो पाता है
'रुक जाना' या 'चल पड़ना'
 
 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, १ अक्टूबर २०१०


आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...