Wednesday, October 27, 2010

मैं अब तक पारदर्शी हूँ

 
यहाँ
कई रंगों के झंडे हैं
एक वो भी रंग है
जिसमें सब समा जाते हैं
एक वो भी
जिससे सब घबरा जाते हैं

मैं अब तक
पारदर्शी हूँ
 कोई भी रंग
मुझ पर ठहरता नहीं 
इस तरह रंगमुक्त या रंगहीन होना
मेरे लिए
वरदान है या अभिशाप?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका


2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सत्य को दिखा देने का गुण पारदर्शी में ही हो सकता है।

Arvind said...

mere vichar se ye Varadan he

कविता

कविता न नारा न विज्ञापन कविता सत्य खोजता मेरा मन कविता न दर्शन न प्रदर्शन कविता अनंत से खेलता बचपन कव...