Tuesday, October 12, 2010

शिखर की मुस्कान

 
धक्का दे देकर
उसे रस्ते से हट जाने के लिए
उकसाता रहा कोई
उसकी जमा पूंजी को
नकली नकदी कह कर उसे
दरिद्र बताता रहा कोई

और
वो भी सोचने लगा था
क्या
पंक्ति से हट जाए
शिखर तक
पहुँचने की
चाहत से पलट जाए

पर तभी
शिखर की मुस्कान से
छू गया अपना आप
फूट गया
 रोम रोम से
गति का सहज आलाप


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ अक्टूबर २०१०

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

शिखर की मुस्कान नशीली होती है।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...