Monday, October 4, 2010

मैं वही हूँ

 
पुराने दिन
कहीं जाते नहीं हैं 
बैठे रहते हैं
अपनी खुशबू के साथ
बहती नदी के किनारे
और
ये किनारा भी चलता है
साथ-साथ नदी के
 
किसी के रुकने का भ्रम 
जरूरी है
गति का भान बनाए रखने के लिए
बस इसीलिए
रोक दिया है अब
तुम्हारी यादों की रेल का चलना
वैसे
बदलते बदलते भी
सचमुच बदला तो नहीं है
कुछ भी
भीतर किसी
अनाम स्थल के मधुर एकांत में 
मैं वही हूँ


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ अक्टूबर २०१०



2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

शान्त से बन पड़े रहते हैं, अपने होने का भाव दिखाने।

वन्दना said...

बहुत सुन्दर ख्याल्।

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