Wednesday, October 20, 2010

विस्तृत मौन की मधुरिमा में




 
इस बार
कहीं से भी
ढूंढ कर लानी है
वह मणि
जिसकी चमक से
यह 'एकाकीपन' का श्राप धुल जाए

शपथ लेकर
नई नवेली ओस की बूँद की
किरणों के सागर में
साँसों का सार लेकर
उतरा वह
असीम का आव्हान कर
 
और 
हो रहा विलीन
उसी चमक में
जिसे बिखेरती थी
सहज पावनता प्रसरित करती
एक मणि

विस्तृत मौन की मधुरिमा में
लहराया एक 'बोध'
भेद नहीं है 
सर्वोत्तम को 'पाने' और 'स्व के खो जाने में'
 
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका


1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

मणि तो मन में ही है।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...