Friday, September 30, 2011

मुक्ति का अनुभव

(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

अदृश्य होता भीतर का प्रवेश द्वार
किसी छल का होकर शिकार
सिमट जाती है सुनहरी सीढियां
खोखलेपन में गूंजती है पुकार


कर लेने सत्य का साक्षात्कार
कोई पथ नहीं सूझता इस बार
मन-आँगन में बिछा अहंकार
दृष्टि कैसे प्रखर हो इस बार


दिखावे ने बदल दिया आधार
देखते देखते बदल रहे विचार
फिर ले समर्पण, धैर्य और श्रद्धा 
कर लेना है अपना परिष्कार  
 
न जाने कैसे, शाश्वत सम्पर्क सो जाता है
अपना ही चेहरा अजनबी हो जाता है 
एक छटपटाहट सी सुगबुगाती है
जब मुक्ति का अनुभव कहीं खो जाता है



अशोक व्यास
वर्जिनिया, अमेरिका
शुक्रवार, ३० सितम्बर २०११  
 
 
 
    
     

Tuesday, September 27, 2011

सब मन की चंचलता है



लिख कर
अपनी बात मिटाए जाता है
जो कुछ है
वो बात छुपाये जाता है
अब उसकी
क्या खबर बताये लोगों को
जिसके दम पर
कदम बढाए जाता है


रास्ते की पहचान भुला कर चलता है
रुक कर भी जाने क्यूं खुद को छलता है 

बीच भंवर के नाव दिखाई देती है
या जो कुछ है, सब मन की चंचलता है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ सितम्बर २०११  
 

 
 
 
 
 
 
 

   
     

Monday, September 26, 2011

आज उजाले के घर की देहरी पर हूँ

(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

अब थकान अपने हिस्से की साथ लिए
सपनो के कुछ किस्सों की सौगात लिए
आज नदी को दिखलाने ले आया हूँ
निशां चोट के, साँसों में शह-मात लिए


कहाँ चलूँ अब, ये उलझे हालात लिए
कब तक उफ़ न करूँ, ऐसे आघात लिए
आज उजाले के घर की देहरी पर हूँ
भीतर कैसे जाऊं, ग़म की रात लिए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ सितम्बर २०११   

Sunday, September 25, 2011

जीत की रीत


इस बार 
जब उठ कर चलना
होने लगा भारी,
उसने फिर 
आस्मां को दिखलाई
अपनी लाचारी,
अपने माथे से
बोझ की
पोटली उतारी   
 और सौंप दी
अनंत को 
अपनी जिम्मेवारी


इस बार
उसने मांगे
नए गीत,
प्रेम के साथ
श्रम का संगीत,
कहा
करूणामय से
सिखलाओ ना
मुझे भी
जीत की रीत
 
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ सितम्बर २०११      


     
     

Saturday, September 24, 2011

नित्यमुक्त अवस्था तक..


(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

(फोटो- विशाल व्यास)

उसे मालूम है
खुल सकता है अब भी
उस तहखाने का द्वार
जहाँ
'बेचैनी के बादल' हैं
'चिंताओं के घूँघरू' हैं
और
'ऊहा-पोह' के जाल में
अटक कर
सिसकते मन के 
ऐसे चित्र हैं
जो छूने मात्र से
हो सकते हैं जीवित

उसे मालूम है
विस्तार के परिचय में
सिर्फ समन्वय ही नहीं
विखंडित कराह का स्वर भी
छुपा है कहीं

पर
अब वो ये भी जानता है
कि वही समा सकता है
उसकी साँसों में
जिसे वो अपना मानता है 

और
अपना मानने के जादू को लेकर
नित्यमुक्त अवस्था तक
ले जाने वाली सीढ़ियों को
अब 
वो पहचानता है




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२४ सितम्बर २०११    
         

Friday, September 23, 2011

रस सागर में स्नान करो ना






रस सागर में स्नान करो ना
जीवन का आव्हान करो ना
लिए साथ में प्रेम की भाषा
अब नूतन प्रस्थान करो ना

अपनेपन का मान करो ना
हर मुश्किल आसान करो ना
वो जो गुणातीत है प्यारे
तुम उसका गुणगान करो ना
 
 
-अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२३ सितम्बर २०११  
 
 

Thursday, September 22, 2011

तुम मस्ती अनंत वैभव की

(फोटो- अशोक व्यास)

जीवन है बस सार तुम्हारा
पग पग पर आधार तुम्हारा
तुम मस्ती अनंत वैभव की
खेले मुझसे प्यार तुम्हारा

हर पथ पर त्यौहार तुम्हारा
अमृतमय संसार तुम्हारा
देख-देख कर अनुभव अपने 
छू लेता उजियार तुम्हारा



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२२ सितम्बर २०११    

Wednesday, September 21, 2011

उत्सव उसके स्पर्श का

(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

उठता है
कैसे 
वह
अपने भीतर
लेकर
आनंद का ज्वार सा

छेड़ देता
रागिनी पूर्णता की
धुल कर 
संताप
 नूतन और स्वच्छ दर्पण बना कर
क्या देखता है
वो स्वयं को मुझमें?


उत्सव उसके स्पर्श का
अनवरत
मनता है
साँसों में

फूटती है 
मुस्कान रोम-रोम से

तन्मय उसकी उपस्थिति में
अब
कहीं जा नहीं पाता
है ही नहीं कोई जगह ऐसी
जहाँ पहले से नहीं हूँ मैं


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ सितम्बर 2011
       

Tuesday, September 20, 2011

उस घर की तलाश



(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

और सहसा
कोई एक शुभचिंतक
पूछ लेता है
खुले आस्मां के नीचे
चलते देख कर मुझे

कब बनाओगे अपना घर?


विस्तार की अनुभूति,
स्थूल दीवारों की आश्वस्ति
दे नहीं पाती किसी को

 फिर भी
छत का अपनापन
दीवारों का घेरा
व्यवस्था का निश्चित स्वरुप
और
सुरक्षा की मदमाती छाँव
 खोजते खोजते
हम 

एक घर से दूसरे घर तक पहुँच कर भी
छोड़ नहीं पाते 
उस घर की तलाश
जिसका पता हमारी साँसों के साथ आता है
पर चलते-चलते, छोटी-छोटी तलाश में खो जाता है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                 २० सितम्बर २०११              

Monday, September 19, 2011

मांगलिक चिन्ह





और फिर
दिन ऐसे आते हैं
जैसे लहर पर बिठा कर
मौजी खिलाता है कोई

एक के बाद दूसरा
दूसरे के बाद तीसरा
दिन पर दिन
मंगल स्फूर्ति का स्वाद चखते
धीरे धीरे
डूबते हुए
अपने आप में
देखते हैं 
वह सब
जो होता है
वह सब
जिससे हमारा होना होता दिखाई देता है

फिर 
एक क्षण
बिना किसी टूटन के
विलग हो जाता है
हमारा संपर्क
इस सारे मेले से

और
अपने आप में परिपूर्ण
गतिविधियों की श्रृंखला को
होते हुए देखते हैं हम
 हमें निमित्त बना कर
खेलता है जो
उसकी झलक पाकर

और अधिक अच्छी लगने लगती है
ये लहरों की मौजी
और
लहर से उतर कर भी
बना रहता है
अंतस मे
उस परम खिलाडी का
         मांगलिक चिन्ह          


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, १८ सितम्बर २०११      

Friday, September 16, 2011

एक मधुर मौन

(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

यह जो प्रसन्नता का 
नया नया आलोक है
इस उजियारे में
मेरी धडकनें 
बुनती हैं 
प्रीत के नए छंद   

मैं मगन होकर
साथ गगन के
फैला देता 
अपनी बाहें
और
आलिंगनबद्ध कर लेता
अपने ही विस्तृत निराकार आकार को

गुंजरित होता
अनंत का संगीत
कण कण में जो

अनुनादित है
ह्रदय 
उसी के नाद से
जब
इस क्षण

यूँ लगता 
स्वतः प्रसार होता है
एक मधुर मौन का

केंद्र 
इस अनिर्वचनीय मौन का होकर
देखता हूँ
तो खिलता है बोध
कण-कण में केंद्र है
इसी 'स्व-प्रकाशित' करूणा का  
          


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१६ सितम्बर २०११  

Wednesday, September 14, 2011

एक विस्तृत पहेली



(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

जैसे वायुयान का कप्तान
कॉकपिट छोड़ कर
बैठ जाए
निश्चल होकर
देखने लगे आसमान,
जैसे 
बंद हो जाए
धरती के गुरुत्व का असर
अदृश्य हो जाए हर सामान,

जैसे
अपनी होकर भी
अपनी न लगे
बनती- बिगडती पहचान,
जैसे
किसी बंद कुएं से
निकल आये 
निष्क्रिय कर, बेसुध बनाती
भूली-बिसरी तान,

ऐसे में
जब स्वयं का स्वयं से जुड़ाव
छूट सा जाता है
जीवन ऐसा
जैसे कोई ताश के पत्तों से
महल बनाता है


पाँव धरा तो जाता है 
धरती पर
पर दृढ़ता का भाव
उभर नहीं पाता है
एक विस्तृत पहेली सी है
साँसों में
 समाधान की तलाश करते-करते
हर बार
तेरा नाम मिल जाता है

न जाने क्यूं
मूल है मेरा, यह जो नाम
मुझमें पनप नहीं पाता है
बार-बार 
पकड़ता हूँ, फिर-फिर
छूट जाता है

कभी उत्साह और स्पष्टता से
भागता हूँ
स्वर्णिम पथ पर,
कभी पथ के साथ-साथ
गंतव्य का भान भी खो जाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
१४ सितम्बर २०११



अतिरिक्त
लिख-लिख कर
करता हूँ
अपने सत्य का अनुसंधान
अभिव्यक्ति में
प्रकट हो जाती
एक अदृश्य उड़ान

यह जो
नहीं देता है दिखाई
इसे मैं तब ही 
शब्दों के सहारे देख पाता हूँ
जब
ईमानदारी और निश्छलता से
पूरी तरह
शब्दों के हवाले हो जाता हूँ
   
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
१४ सितम्बर २०११

Tuesday, September 13, 2011

एक अकेलापन

(फोटो- डाक्टर विवेक भारद्वाज)


तिरता नहीं
मंडराता है
चमगादड़ की तरह 
अपने डैने फैला कर
मुझे डराने की कोशिश करता
एक अकेलापन

रूकता नहीं
चलता जाता
देखता हूँ
रह रह कर
चलते-चलते आसमान
और जब
हाथ मिलाने, हाथ बढाता 
ठहर न पाता 
लुप्त हो जाता अकेलापन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ सितम्बर २०११    

Monday, September 12, 2011

आगे बढ़ने का रास्ता




उसने अपनी हथेलियों को
धूप से धोकर
हाथ की रेखाओं में
ठहरे हुए उजियारे से
जब
आगे बढ़ने का रास्ता पूछा

धडकनों ने 
किरणों से चुराई हुए हंसी
खनकाते हुए
रख दिया उसके सामने
उमंगों का नया नगर

और
आँखों ने दिखला दिया
नयी संभावनाओं का रास्ता

माटी ने कहा
अँधेरा होने से पहले
उजियारी रेखाओं पर 
चढ़ा दो मेरी परत

श्रम के साथ
माटी में मिले बिना
अमिट नहीं हो सकता
 उजियारा



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ सितम्बर 2011          
  

Sunday, September 11, 2011

हर सीढ़ी पर







1

तडपाती रहती है जिसकी प्यास
वो रहता तो है अपने आस-पास
पर अदृश्य रह कर बरसों तक
 एक दिन मिल जाता अनायास

 २

इस बार रंग ले आया 
नए सिरे से ढूंढ लेना 
पुरानी समस्या का समाधान
न जाने कैसे
हर सीढ़ी पर मिलता गया आस्मां
सब कुछ हो गया आसान
 


कब, कौन, कैसे मिल जाता है
इसके पीछे जिसके होने की गाथा है
कल्याणकारी है हर वो अनुभव 
जो उससे सम्बन्ध बनाना सिखाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ सितम्बर २०११   
 
 


    

     

Saturday, September 10, 2011

अपने हाथों की लिखाई



 
 
अब
  अपने हाथों की लिखाई का मोह भी
छूट रहा है 
 धीरे धीरे  
   शायद अपने लिखे को सुरक्षित और 
व्यवस्थित
रखने में
 अधिक समझ और स्थान, दोनों चाहिए
 
 और 
 ये आश्वस्ति भी
  की 'हमारे लिखे शब्दों' का
किसी के लिए 
 वैसा 'भावनात्मक महत्त्व' है
 जैसा हमारे लिए हुआ करता था
 
टेक्नोलोजी 
  धीरे-धीरे
  चुस्त जीवनशैली 
  सुविधाओं के साथ इस तरह घोल रही है 
  हमारे जीवन में
 की 
भावनाओं को पिछली सीट पर बिठा कर
    स्वीकृत समूह का हिस्सा बनने की बाध्यता में
हम बदलते जा रहे हैं
 
 
तुम्हारे साथ 
  आज इस बदलाव को पहचानने बैठा
तो पुराने कितने किस्से याद आये
  जिनमें 'मेरी लिखाई' के वो सब ख़त भी थे
   जो बरसों बरस साथ रहे तुम्हारे


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० सितम्बर २०११  


हमारा सामूहिक ध्यान



अब
पुरस्कार लेकर
मंच से उतरते हुए भी
प्रसन्नता के कम्पन्न
नहीं होते ह्रदय में
वह
इस तरह
पचा गया है
सफलता की अनुभूति
की
अपने लिए 
सहानुभूति का पात्र 
  हो गया है     



अब  
स्तरहीनता पर
आश्चर्य नहीं होता,

 दिन-दिन  
 बड़े पैमाने पर 
'त्याज्य पदार्थ और मूल्य'
 प्रकाशित केंद्र में
पहुँच कर
छीन रहे हैं
हमारा सामूहिक ध्यान,

   खुलेपन के नाम पर
     जीवन की गरिमा, सौन्दर्य और संवेदनशीलता के प्रति
    बंद होते जा रहे हम.


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१० जून २०११ को लिखी
  १० सितम्बर २०११ को लोकार्पित
 

Friday, September 9, 2011

खेल मेरा है ही नहीं






 
परत के पार
 आनंद का 
अनूठा ज्वार,
 उमड़ता है मानस में 
 गति के साथ
विस्तार,
 अब नहीं सता रहे
जीत और हार,
  खेल मेरा है ही नहीं
   उसी का है इस बार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिया
९ सितम्बर 2011 


 

Thursday, September 8, 2011

अनंत की गाथा







दिन दिन
खुलती जाती हैं गांठें
और अधिक मात्रा में
सुलभ होता है मुक्त गगन

अनंत की गाथा
सुनाता समय

 होता असर
इस अक्षय कथा का
जब
कर पाता श्रवण
तन्मय होकर

   इस प्रभाव में  
उत्सव मनाता हूँ
 उस सबका     
   जो पाता हूँ
 और उसका भी
  जो छोड़ जाता
या जिससे छूट जाता हूँ 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
 

Wednesday, September 7, 2011

अपनी अधीरता के कारण

फिर बात तुम्हारी करता है
 लेकिन वो खुद से डरता है 






नए सिरे से 
  अब रिश्ता बनाना है
 इस चुप्पी से
    जो प्रकट है यूँ तो
    मेरी ही प्रार्थना से

 पर इतनी शांति में
 बिना किसी आवरण के
स्वयं को देखने का
धीरज और साहस
  सुलभ नहीं है
 शायद इस क्षण

इसीलिए
जाना पहचाना शोर बुला कर
दूर हो रहा 
   इस चुप्पी से
जिसमें
 सृजन सार है 
    मेरे और सृष्टि के सम्बन्ध का


 अब फिर
  भटकाव का खेल, खेल
जब लौटूंगा यहाँ
  नए सिरे से
 करनी होगी प्रार्थना
   इस चुप्पी के लिए
   जिससे दूर हो रहा
 अपनी अधीरता के कारण अभी


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका 
७ सितम्बर २०११  

Tuesday, September 6, 2011

उसकी अंगुली थाम कर

(चामुंडा माता का मंदिर, मेहरानगढ़ दुर्ग, जोधपुर - फोटो विशाल व्यास )

इस बार
उसकी अंगुली थाम कर
 चलते- चलते  
जरूरी नहीं लगा 
 की कद बढ़ा कर
अपने आप पर निर्भर होने की
अनुभूति लिए
दिशाओं से
 चुनौतियों की नई सौगात ले लूं

  इस बार
  उसकी अंगुली थाम कर
 चलते -चलते
 ना जाने कैसे
मिट सा गया
धरती और गगन का भेद

 मगन उसके साथ से झरती आश्वस्ति में
जानता था
  बाल रूप में  
रहने तो न देगी वो मुझे देर तक
 समझ गया था 
 परिवर्तन उस अपरिवर्तनीय का खेल है
 और 
 सोचने लगा था
  मुझे भी बना लेना है
 कोई ऐसा खेल
 की चाहे जो रूप हो मेरा
भाव यह जाग्रत रहे
 की  
    उसकी अंगुली थाम कर चल रहा हूँ मैं 
 और
   संबल के साथ दिशा संकेत भी दे रही है

 उसकी अदृश्य मौन उपस्थिति




अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ सितम्बर २०११   

Monday, September 5, 2011

सचमुच तो बस वही है


सुना तो था
    की होता है ऐसा
सबके बीच होकर भी
सबसे अलग
 छूकर छा जाता है 
मानस में
उस 'अदृश्य' का होना

और
   भर जाते हैं ह्रदय में    
अनुपम आश्वस्ति
अतुलनीय समृद्धि
 और 
अपार प्रेम के साथ
सूक्ष्म, सरस आनंद
 
उसके होने की कौंध
 खोल देती है  
विस्मयकारी सहनशीलता
 सुलभ करवाती है
समन्वयकारी दृष्टि

  माधुर्य के साथ
बिन प्रयास
  सध जाता है लक्ष्य

  उसका माध्यम होने का गौरव
 से उतरती है 
 अंतस में जो
परम तृप्ति,
 इसके आलोक में
 सुन्दर सार श्रृंगार कर लेता है जीवन

  आज जब अनुभव में आ गयी
यह सुनी सुनाई बात
  संकोच होता है
  किसी से कहने में
 कौन मानेगा की
  "जो दीखता है
 वो नहीं है
     और जो दीखता नहीं है
  सचमुच तो बस वही है"


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
६ सितम्बर २०११   
 

Sunday, September 4, 2011

परत दर परत



आज जब 
कुछ भी नया नहीं है 
कहने को

 नीरवता में
नदी के शांत जल की सतह पर
एक कंकर फेंकता हूँ
तुम्हारी स्मृति का

और 
 धीरे धीरे
खुलने लगते हैं
अनकहे रास्ते

 देख पाता हूँ  
वो सब
  जो किया है तुमने
मेरे वास्ते


2

    आज जब कुछ भी
  कहने का अवसर हुआ
   तुमने नया-नया बना दिया
 हर बात को

जैसे 
 परत दर परत
   कुछ और गहरे में
दिखाई देता रहा
मुझसे पहचान बढाता 'मैं'
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ सितम्बर 2011 
    

Saturday, September 3, 2011

क्रांति की शुरुआत




एक दिन में
कितने उतार-चढ़ाव,
कभी मरहम,
 कभी आकारहीन घाव,
संकट सा
उभर आता उन बातों से
जिनका होता है
जोरदार चाव,



 यूँ सोचा है
  एक दिन
 ऐसा मन बनाऊं,
 जहाँ-जहाँ जाऊं,
तुम्हें देख पाऊँ,
 हर दिशा में 
बस तुम्हारी याद का
उत्सव मनाऊँ




  हो चुकी है
मेरे भीतर
क्रांति की शुरुआत,
अब 
अच्छी लगने लगी
 तुम्हारी हर बात,


  यूँ  भी हुआ
मैं सुन पाया
  सांसों में 
तुम्हारा फुसफुसाना,
 और
 मुखरित हो गया मुझसे
 तुम्हारे अस्तित्त्व का
 तराना

     
  
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
 ३ सितम्बर २०११ 




  एक और शब्द द्वीप


ये अनदेखा करके कि
बीज के मिटे बिना
वृक्ष नहीं देता दिखाई,

बीज को बचाने में ही
 हमने पूरी उम्र बिताई


   मिटने और बनने में
 अभेद वाली बात
  समझ ही नहीं आई
   

    ऐसा भी सोचा है
एक दिन
 तुम्हारी सोच में 
 घुल जाऊं
 संकरी गलियों से निकल 
विस्तृत दिव्य पथ
अपनाऊँ

 - अशोक व्यास

Friday, September 2, 2011

आत्म-सौन्दर्य में लीन



 खेल खेल में
बनाया माटी का सुन्दर घर
और फिर
 चल दिया, घर बिखेर कर 

  बना कर तोड़ने में 
ना कोइ दुःख, ना अफ़सोस 
  खेल तो खेल है 
  इसमें किसी का क्या दोष 


 हम जो घर बनाते हैं
 उससे चिपक जाते हैं 
 उससे परे हमारा होना
 सोच ही नहीं पाते हैं 



     धीरे धीरे,
अपना घर, अपना काम
अपने सम्बन्ध, अपना नाम 
  इनमें बंध कर, लग जाता
चेतना के विस्तार पर विराम

    फिर गुरुकृपा से, किसी क्षण 
 जब हम आत्म-दरसन पाते हैं
आत्म-निर्भरता का मर्म
   थोडा-थोडा समझ पाते हैं


 अनंत स्पर्श से, चेतना की 
सीमातीत पहचान पाते हैं
        तब आत्म-सौन्दर्य में लीन
      जगजननी की महिमा गाते हैं

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
 २ सितम्बर २०११
  (स्वामी श्री ईश्वरानन्द गिरिजी महाराज के "देवी तत्त्व" पर
 प्रवचन श्रवण के प्रभाव से प्रकट अभिव्यक्ति)

Thursday, September 1, 2011

चौकन्ने हो जाओ



सत्य क्या है
इस बार अपने आधार के हिलने पर
 अपनी हलचल पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए
स्वयं से पूछा उसने
 और भीतर से
कौंध गया उत्तर
     "सत्य वो परम आश्वस्ति
 जो तुम्हारे अनुभव जगत में मंडराती
  तुम्हारे मन में खलबली मचाती
तुम्हें डराती
या तुम्हारा चैन चुरा ले जाती
   सारी हलचल को झूठ बना देती है "



  अब वो स्वयं से पूछने लगा
  क्या करूँ की सत्य मेरा आधार हो जाए
जवाब कौंधा
 "चौकन्ने हो जाओ
चौकन्ने होकर देखो
  हर विचार, हर भाव, हर कामना का उठना
  देखो सब कुछ
  अनंत के आलोक में,
  और अनुभूति क्षेत्र
जब नित्य निरंतर
संवित स्पंदन से अनुनादित हो जायेगा
  तुममें
   और सत्य में
  कोई अंतर नहीं रह पायेगा"


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१ सितम्बर २०११   



आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...