Sunday, September 25, 2011

जीत की रीत


इस बार 
जब उठ कर चलना
होने लगा भारी,
उसने फिर 
आस्मां को दिखलाई
अपनी लाचारी,
अपने माथे से
बोझ की
पोटली उतारी   
 और सौंप दी
अनंत को 
अपनी जिम्मेवारी


इस बार
उसने मांगे
नए गीत,
प्रेम के साथ
श्रम का संगीत,
कहा
करूणामय से
सिखलाओ ना
मुझे भी
जीत की रीत
 
 
 
 
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२५ सितम्बर २०११      


     
     

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

आकाश की विशालता में आबद्ध जीवन की उलझन।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...