Monday, September 26, 2011

आज उजाले के घर की देहरी पर हूँ

(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

अब थकान अपने हिस्से की साथ लिए
सपनो के कुछ किस्सों की सौगात लिए
आज नदी को दिखलाने ले आया हूँ
निशां चोट के, साँसों में शह-मात लिए


कहाँ चलूँ अब, ये उलझे हालात लिए
कब तक उफ़ न करूँ, ऐसे आघात लिए
आज उजाले के घर की देहरी पर हूँ
भीतर कैसे जाऊं, ग़म की रात लिए


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ सितम्बर २०११   

2 comments:

वन्दना said...

वाह भीतर कैसे जाऊँ गम की रात लिये…………गज़ब के भावो का संग्रह्।

प्रवीण पाण्डेय said...

भीतर कैसे जाऊं, ग़म की रात लिए

रहस्यमय..

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...