Tuesday, September 27, 2011

सब मन की चंचलता है



लिख कर
अपनी बात मिटाए जाता है
जो कुछ है
वो बात छुपाये जाता है
अब उसकी
क्या खबर बताये लोगों को
जिसके दम पर
कदम बढाए जाता है


रास्ते की पहचान भुला कर चलता है
रुक कर भी जाने क्यूं खुद को छलता है 

बीच भंवर के नाव दिखाई देती है
या जो कुछ है, सब मन की चंचलता है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२७ सितम्बर २०११  
 

 
 
 
 
 
 
 

   
     

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

लहरों का अधिकार नाव पर।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...