Friday, September 30, 2011

मुक्ति का अनुभव

(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

अदृश्य होता भीतर का प्रवेश द्वार
किसी छल का होकर शिकार
सिमट जाती है सुनहरी सीढियां
खोखलेपन में गूंजती है पुकार


कर लेने सत्य का साक्षात्कार
कोई पथ नहीं सूझता इस बार
मन-आँगन में बिछा अहंकार
दृष्टि कैसे प्रखर हो इस बार


दिखावे ने बदल दिया आधार
देखते देखते बदल रहे विचार
फिर ले समर्पण, धैर्य और श्रद्धा 
कर लेना है अपना परिष्कार  
 
न जाने कैसे, शाश्वत सम्पर्क सो जाता है
अपना ही चेहरा अजनबी हो जाता है 
एक छटपटाहट सी सुगबुगाती है
जब मुक्ति का अनुभव कहीं खो जाता है



अशोक व्यास
वर्जिनिया, अमेरिका
शुक्रवार, ३० सितम्बर २०११  
 
 
 
    
     

3 comments:

कुश्वंश said...

आपकी लेखनी की धार प्रखर हो रही है , प्रवाहमयी बधाई

प्रवीण पाण्डेय said...

बंधे होने का भाव पीड़ादायक है।

Ashok Vyas said...

praveenjee, rachna ke bhav sthal par pahunch kar samvaad karne kee is atmiya shrankhla ke liye abhaar
2
Kushwanshji, rachnatmkta kee jyotsna ke darsan karne kee aapkee patrta ko naman aur us parichay ko mujh tak pahunchane ke liye abhaar

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...