Saturday, October 1, 2011

बिना पतवार हिलाए



एक शांत क्षण की आभा के
प्रकटन में
फिर से
दीप्त है
कृतज्ञता की किरणें 

मैं
जैसे जैसे
देखता हूँ
शांति नदी की सतह पर
बिना पतवार हिलाए
आगे बढ़ती नाव अपनी

विस्मित होकर
देखता हूँ उसे
जो अदृश्य रह कर भी
बना है हमेशा साथ मेरे


अशोक व्यास
वर्जिनिया, अमेरिका
१ अक्टूबर २०११  
         

3 comments:

सूर्यकान्त गुप्ता said...

एक शांत क्षण की आभा के
प्रकटन में
फिर से
दीप्त है
कृतज्ञता की किरणें ....खूबसूरत रचना

प्रवीण पाण्डेय said...

वही तो परमात्मा है।

Rakesh Kumar said...

विलक्षण अनुभव हैं आपके.

आप न्यूयार्क से वर्जीनिया पहुँच गए है क्या ?

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...