Sunday, October 2, 2011

तात्कालिक दर्द के पार



दर्द की रेखाएं
जब
फैलने लगती हैं
अनुभव की हथेली पर
सिमटता जाता है संसार

मुश्किल होता है
कुछ भी देख पाना
अपने तात्कालिक दर्द के पार

ऐसे में
करता हूँ पुकार
ओझल न हो
सृष्टि सार



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ अक्टूबर 2011             

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

तात्कालिक दर्द भटका देता है।

वाणी गीत said...

तात्कालिक दर्द के पार देख पाने की प्रार्थना ...
दुआएं हमारी भी !

अनुपमा त्रिपाठी... said...

तात्कालिक दर्द तो क्षणिक ही है .....बदलते मौसम की तरह ये समय भी बीत जायेगा .....रात गहराने लगे समझ जाएँ भोर होने वाली है ....
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

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