Monday, September 12, 2011

आगे बढ़ने का रास्ता




उसने अपनी हथेलियों को
धूप से धोकर
हाथ की रेखाओं में
ठहरे हुए उजियारे से
जब
आगे बढ़ने का रास्ता पूछा

धडकनों ने 
किरणों से चुराई हुए हंसी
खनकाते हुए
रख दिया उसके सामने
उमंगों का नया नगर

और
आँखों ने दिखला दिया
नयी संभावनाओं का रास्ता

माटी ने कहा
अँधेरा होने से पहले
उजियारी रेखाओं पर 
चढ़ा दो मेरी परत

श्रम के साथ
माटी में मिले बिना
अमिट नहीं हो सकता
 उजियारा



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१२ सितम्बर 2011          
  

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

श्रम को आशीर्वाद मिले विधाता का।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...