Sunday, September 11, 2011

हर सीढ़ी पर







1

तडपाती रहती है जिसकी प्यास
वो रहता तो है अपने आस-पास
पर अदृश्य रह कर बरसों तक
 एक दिन मिल जाता अनायास

 २

इस बार रंग ले आया 
नए सिरे से ढूंढ लेना 
पुरानी समस्या का समाधान
न जाने कैसे
हर सीढ़ी पर मिलता गया आस्मां
सब कुछ हो गया आसान
 


कब, कौन, कैसे मिल जाता है
इसके पीछे जिसके होने की गाथा है
कल्याणकारी है हर वो अनुभव 
जो उससे सम्बन्ध बनाना सिखाता है


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
११ सितम्बर २०११   
 
 


    

     

2 comments:

वन्दना said...

bahut khoobsoorat chitran kiya hai.

प्रवीण पाण्डेय said...

घर में रहता, बाहर रहता,
सबके हित की कहता रहता।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...