Tuesday, September 13, 2011

एक अकेलापन

(फोटो- डाक्टर विवेक भारद्वाज)


तिरता नहीं
मंडराता है
चमगादड़ की तरह 
अपने डैने फैला कर
मुझे डराने की कोशिश करता
एक अकेलापन

रूकता नहीं
चलता जाता
देखता हूँ
रह रह कर
चलते-चलते आसमान
और जब
हाथ मिलाने, हाथ बढाता 
ठहर न पाता 
लुप्त हो जाता अकेलापन


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१३ सितम्बर २०११    

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

हर बार कुछ न कुछ बता जाता है, अकेलापन।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...