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(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज) |
जैसे वायुयान का कप्तान
कॉकपिट छोड़ कर
बैठ जाए
निश्चल होकर
देखने लगे आसमान,
जैसे
बंद हो जाए
धरती के गुरुत्व का असर
अदृश्य हो जाए हर सामान,
जैसे
अपनी होकर भी
अपनी न लगे
बनती- बिगडती पहचान,
जैसे
किसी बंद कुएं से
निकल आये
निष्क्रिय कर, बेसुध बनाती
भूली-बिसरी तान,
ऐसे में
जब स्वयं का स्वयं से जुड़ाव
छूट सा जाता है
जीवन ऐसा
जैसे कोई ताश के पत्तों से
महल बनाता है
पाँव धरा तो जाता है
धरती पर
पर दृढ़ता का भाव
उभर नहीं पाता है
एक विस्तृत पहेली सी है
साँसों में
समाधान की तलाश करते-करते
हर बार
तेरा नाम मिल जाता है
न जाने क्यूं
मूल है मेरा, यह जो नाम
मुझमें पनप नहीं पाता है
बार-बार
पकड़ता हूँ, फिर-फिर
छूट जाता है
कभी उत्साह और स्पष्टता से
भागता हूँ
स्वर्णिम पथ पर,
कभी पथ के साथ-साथ
गंतव्य का भान भी खो जाता है
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ सितम्बर २०११
अतिरिक्त
लिख-लिख कर
करता हूँ
अपने सत्य का अनुसंधान
अभिव्यक्ति में
प्रकट हो जाती
एक अदृश्य उड़ान
यह जो
नहीं देता है दिखाई
इसे मैं तब ही
शब्दों के सहारे देख पाता हूँ
जब
ईमानदारी और निश्छलता से
पूरी तरह
शब्दों के हवाले हो जाता हूँ
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१४ सितम्बर २०११
2 comments:
ऐसे ही जीवन उन्मुक्त छोड़ दे हम।
प्रवाहमयी काव्य , अतरिक्त भी सुन्दर
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