Tuesday, September 20, 2011

उस घर की तलाश



(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज)

और सहसा
कोई एक शुभचिंतक
पूछ लेता है
खुले आस्मां के नीचे
चलते देख कर मुझे

कब बनाओगे अपना घर?


विस्तार की अनुभूति,
स्थूल दीवारों की आश्वस्ति
दे नहीं पाती किसी को

 फिर भी
छत का अपनापन
दीवारों का घेरा
व्यवस्था का निश्चित स्वरुप
और
सुरक्षा की मदमाती छाँव
 खोजते खोजते
हम 

एक घर से दूसरे घर तक पहुँच कर भी
छोड़ नहीं पाते 
उस घर की तलाश
जिसका पता हमारी साँसों के साथ आता है
पर चलते-चलते, छोटी-छोटी तलाश में खो जाता है



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
                 २० सितम्बर २०११              

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

छोटे घरों को खोजने में निकला जाता समय।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...