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(फोटो- डॉ विवेक भारद्वाज) |
उठता है
कैसे
वह
अपने भीतर
लेकर
आनंद का ज्वार सा
छेड़ देता
रागिनी पूर्णता की
धुल कर
संताप
नूतन और स्वच्छ दर्पण बना कर
क्या देखता है
वो स्वयं को मुझमें?
२
उत्सव उसके स्पर्श का
अनवरत
मनता है
साँसों में
फूटती है
मुस्कान रोम-रोम से
तन्मय उसकी उपस्थिति में
अब
कहीं जा नहीं पाता
है ही नहीं कोई जगह ऐसी
जहाँ पहले से नहीं हूँ मैं
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ सितम्बर 2011
1 comment:
सर्वथा नया अनुभव।
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