Sunday, September 4, 2011

परत दर परत



आज जब 
कुछ भी नया नहीं है 
कहने को

 नीरवता में
नदी के शांत जल की सतह पर
एक कंकर फेंकता हूँ
तुम्हारी स्मृति का

और 
 धीरे धीरे
खुलने लगते हैं
अनकहे रास्ते

 देख पाता हूँ  
वो सब
  जो किया है तुमने
मेरे वास्ते


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    आज जब कुछ भी
  कहने का अवसर हुआ
   तुमने नया-नया बना दिया
 हर बात को

जैसे 
 परत दर परत
   कुछ और गहरे में
दिखाई देता रहा
मुझसे पहचान बढाता 'मैं'
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ सितम्बर 2011 
    

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

उस नयेपन को ढूढ़ रहा हूँ।

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