Friday, September 9, 2011

खेल मेरा है ही नहीं






 
परत के पार
 आनंद का 
अनूठा ज्वार,
 उमड़ता है मानस में 
 गति के साथ
विस्तार,
 अब नहीं सता रहे
जीत और हार,
  खेल मेरा है ही नहीं
   उसी का है इस बार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिया
९ सितम्बर 2011 


 

2 comments:

Rakesh Kumar said...

अब नहीं सता रहे
जीत और हार,
खेल मेरा है ही नहीं
उसी का है इस बार

अदभुत व अनुपम समर्पण है आपका.

'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणम व्रज'

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार.

प्रवीण पाण्डेय said...

खेल उसी का, नियम उसी के।

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...