Friday, December 31, 2010

बरस के अंतिम दिन



 
बरस के अंतिम दिन
समय से नया रिश्ता बनाने के नाम पर
खुद के साथ नया पुल रचने का अवसर

ये पुल 
जिस पर भावनाएं, विचार, संभावनायें और सपने आते जाते हैं
ये पुल
जो भागते दिन की गर्त में हम ठीक तरह से देख नहीं पाते हैं
आज
पुरानी चीज़ें टटोलते हुए
अपने
अधूरे संकल्पों से बोलते हुए

आज
आशा का आव्हान कर 
नित्य नूतनता का सत्कार करने का आव्हान
नए बरस में
हर संपर्क में, हर कर्म से
अन्तर्निहित सर्वश्रेष्ठ की महिमा का हो गुणगान 
अशोक व्यास
३१ दिसंबर २०१०
 
 


नव वर्ष के स्वागत की तैय्यारी
उत्साह सुलभ करता शक्ति सारी 

लो फिर से सक्षम बने हम सब
छोड़ कर विवशता और लाचारी
 
नए बरस पर मंगल कामनाएं
प्रसन्न रहें, प्रसन्नता बढ़ाएं  
जय हो
ॐ गं गणपतये नमः 
जय गुरु
जय श्री कृष्ण
जय गुरु
जय शंकर 
जय माता दी
ॐ श्री साईं राम गुरुदेव दत्ता
 





Thursday, December 30, 2010

किसी अलौकिक क्षण में

( गुरु दिखलाते हैं विस्तार, - चित्र- चन्द्रशेखर व्यास, साभार संवित ग्रुप से)

नियम इसलिए नहीं
कि 
छुप जाए मेरा नयापन
वरन इस उद्देश्य से
अपनाता हूँ कोई क्रम
ताकि देख पाऊँ
नूतनता निरंतर


नियम जब
जंगली पगडंडी की तरह
रास्ते के साथ साथ
मुझे भी
छुपाने लगते हैं मुझसे

नए सिरे से
बनाना होता है
सम्बन्ध नियम से

फिर-२ 
नई तरह 
व्यस्थित होकर
स्वयं से जुड़ने का प्रयास
किसी कृपाकिरण के स्पर्श से
पा लेता है अपना प्राप्य

उस किरण का सत्कार करने 
नियम अपनाता हूँ
और किसी अलौकिक क्षण में 
नियम के रूप में
कामधेनु को
अपने साथ पाता हूँ
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, ३० दिसंबर 2010
 
 

Wednesday, December 29, 2010

अपार विस्तार हमारा


ना जाने क्यूं
कई बार हो जाता है ऐसा
कोई एक क्षण नहीं
कालातीत लिखता हूँ,
इस तरह
एक दृष्टि से
जो नहीं हूँ
शब्द में वही दिखता हूँ

 
२ 
सत्य बाधित नहीं

ना सम्बन्ध के समीकरण से
ना जीवन से, ना मरण से
 
सत्य यानि 
चिर मुक्ति का उजियारा,
सत्य यानि
स्वीकरण की शाश्वत धारा,
सत्य ले आता है
संकुचन से परे,
सतत अनावृत हो जाता 
अपार विस्तार हमारा 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, २९ दिसंबर 2010
 


Tuesday, December 28, 2010

समझ के नए सोपान चढ़ने




 
यह कैसे हो जाता है
मन
खाली सलेट सा
जैसे
सुबह की पहली किरण
बिछा दे नई चादर 
घर आंगन पर
नए सिरे से
कुछ रच देने के आमंत्रण के साथ
 
२ 
यह कैसे
समझ के नए सोपान चढ़ने
प्रस्तुत है
मन
जैसे आतुर हो 
कोई शिशु उठा लेने पहला कदम
 
ना जाने किस क्षण 
अब तक का सब जाना हुआ
अब तक का सब सीखा हुआ
हो गया है अर्पित
काल गंगा को

पूरी तरह हल्का होकर
पूरी तरह निर्मल होकर
निर्बद्ध

नए सिरे से
पूर्णता की ओर
चल देने प्रस्तुत हूँ
 
विस्मृत 
सारी खरोचें, सारे घाव
सारी पीडाएं
 
स्वस्थ और मस्त
पूर्ण अपने आप में
अनाम आभा ने
दे दिया है
संपर्क अनायास
 अक्षय प्यार से 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, २८ दिसंबर २०१०






Monday, December 27, 2010

बर्फ की बातें





बर्फ लेकर नाचती है
हवा कभी और कभी
भागती दिखती है बर्फ
किसी वाहन के पीछे
यह जो सफ़ेद बिस्तर सा बिछा है
सड़क पर
 
 
 
लिहाफ ओढ़े ऊंघ रही हैं गाड़ियाँ
कह रही हैं नंगी शाखाएं
पत्ते होते 
तो कुछ देर हमारे साथ भी
बतियाती बर्फ

बर्फ की बातें
अब सुन्दरता से पहले सुरक्षा की याद दिलाती हैं
 
सूर्यकिरण की तरह 
मुझमें से
फूटना चाहती है गति 
और इस गति की गर्म आहट पर
बर्फ हट जाती है
रस्ता दिखाती है
 
स्वप्निल परी 
अपने पंखों के साथ
मेरे मन में 
छुप जाती है
और उड़ उड़ कर 
सबके लिए 
प्रेम और शांति का सन्देश 
पहुंचाती है
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, २७ दिसंबर २०१० 
 



Sunday, December 26, 2010

खेल जीवन का


परिवर्तन 
बाहर का ही नहीं
भीतर का भी होता ही है
जाने-अनजाने

सहेज कर सुरक्षित धरी हुई कामनाएं
हीरे से कंकर हो जाती हैं
अपने आप
 
खेल जीवन का
सजाती जरूर है कामना
पर पूरी हो या ना हो
कामना से परे हुए बिना
मुक्ति की अनुभूति तो
संभव नहीं

जीवन की सफलता शायद 
इस से नापी जाती है 
कि कामना हो
पर उससे बंधे बिना
बहते रहने का कौशल हो

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२६ दिसंबर २०१०


Wednesday, December 22, 2010

ताज़ी हवा का झोंका सा




कैसे हो जाता है
कभी कभी ऐसा 
कि अनुपयुक्त हो जाते हैं
ध्यान के लिए
किसी से प्रेमपूर्ण संवाद के लिए
किसी के उत्साह में 
घुल मिल जाने के लिए

कौन कर देता है
हमें अयोग्य,
सृजनशील प्रवाह का हिस्सा बनने की पात्रता
छिटक जाती है कहीं

ना चित्र
ना कविता
ना जुड़ने-जोड़ने की मधुर लय

कैसे एकाकीपन पैठ कर
हमारे भीतर
बना देता है
एक कोठारी
जिसमें
विषबुझे सवालों से
निर्मम जेलर की तरह
स्वयं को डसते रहते हैं हम

जड़ता की जकड से बाहर आने
किसी झूठ का सहारा लेकर
कभी कभी कर भी लेते है 
असफल प्रयास

मुक्ति के लिए
हर बार सत्य के साथ गतिमान होने का साहस
आवश्यक हो ही जाता है

किसी ना किसी स्तर पर

तो 
घूम फिर कर
सामने आती है
सत्य के साथ एकमेक होने की अनिवार्यता
और इस सजगता के साथ
ना जाने कहाँ से आकर
छू गया है मुझे
ताज़ी हवा का झोंका सा
काल-कोठरी में 

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
बुधवार, २२ दिसंबर २०१०

Tuesday, December 21, 2010

सृजन केंद्र की आभा में तन्मय


मन 
खाली आकाश सा
लील गया है
सारे बिम्ब

शांत विस्तार में
विलीन हुए
संकल्प 

इस विराम में अनुपस्थित है
अभिव्यक्ति की चाहत 
 इस स्थिरता में 
गुदगुदाती सी अनाम लहरें

 सृजन केंद्र की आभा में तन्मय 
मौन में 
दुर्लभ आश्वस्ति का रस संचार करते 
तुम्हारे बोध की अनुभूति करने
अलग बना रहता हूँ
तुमसे
और मेरी पूजा के द्वारा
तुम्हे कुछ मिले या ना मिले
मुझे मिलता रहता है
'तुम्हारे मिल' जाने का सुन्दरतम अनुभव


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२१ दिसंबर २०१०
मंगलवार










Monday, December 20, 2010

आधे इधर, आधे उधर


अपनी ज़मीन को छोड़ कर
तय कर लिया हमने सफ़र
ऐसा हुआ एक मोड़ पर
आधे इधर, आधे उधर
अपनी ज़मीन को छोड़ कर
हम आ गये उस मोद पर
बंटते गये हर बात में
आधे इधर, आधे उधर

दावतों का दौर हो
या मातमी मौसम वहां
हर बार यूँ लगता रहे
वो सब वहां और हम यहाँ
किस्सा अधूरी सांस का
किससे कहें, जाएँ इधर
अब जो भी है, ऐसा ही है
आधे इधर, आधे उधर

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
जून ८, २००७ को लिखी
२० दिसंबर २०१० को लोकार्पित

Sunday, December 19, 2010

तू सुन उसे जो अनसुना


उद्विग्न मन
चिंता मगन
क्या सोचता
क्या खोजता
अब छोड़ कर
हलचल सकल
                                               तू मूल का
                                                      पा ले पता

हर सांस में
हस प्यास में
जिसका समर्पण छा रहा
हर आस का
है प्राप्य जो
तू क्यूं उसे बिसरा रहा

अब व्योम में
हर रोम में
तू सुन उसे
         जो अनसुना
है गीत जो
अमृतमयी
मन बस उसे ही 
                   गुनगुना 
मत कर यतन 
बस तज स्वपन
बन कर निरंतर 
       प्रार्थना
जिसके बनाये
जग बना
 बह प्रेम से
उसको मना


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२० नवम्बर २००८ को रचित
रविवार १९ दिसंबर २०१० को लोकार्पित


Saturday, December 18, 2010

पूर्णता का स्वाद

 
धीरे धीरे
सचमुच हथेली में सिमटा सा है संसार 
मोबाइल युग में कितने लोगों तक
जुड़ने के सूत्र
सुलभ हैं हमारे अँगुलियों को

पर मन अब भी
अचानक
असम्पृक्त होकर सबसे
एकाकीपन में
ढूंढता है
वह संपर्क
जो चखा दे पूर्णता का स्वाद


एक वह संपर्क
जिससे सारयुक्त हो
सम्बन्ध और संवाद

कहीं टूट जाता है
क्या हमसे रूठ जाता है
चलते चलते, ध्यान हटते ही
कहीं छूट जाता है 


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शनिवार, १८ दिसंबर 2010

Friday, December 17, 2010

चिरमुक्त प्यार की नई कोपलें




 
कैसे जुड़ते जाते हैं
सारे सन्दर्भ
एक केंद्र से
सुन्दर समन्वय बनाते
नई आभा जगाते
श्रद्धा के तार झंकृत कर
मधुर मौन में ले जाते

सन्दर्भ
जिनमें एक अंतरहित बोध गुनगुनाता है
स्मृतियाँ  
जिनमें परम चरम का आलोक ठहर जाता है

वो सब
घुमावदार रास्ते
पहाड़ की चोटी से
सुन्दर लगते हैं
जिन पर कभी
बेचैन करता था अनिश्चय

यह विहंगम दृश्य
यह क्षितिज तक का विस्तार दिखलाती दृष्टि
चिरमुक्त प्यार की नई कोपलें
यहाँ से 
वहां तक जाती हैं
जहां 
सारे सन्दर्भों में
एक ओजस्वी सूत्र दिखाई देता है

और शब्दों के बीच
उभर आता है
वह अंतराल जिसमें
समाये हैं तीनो काल


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
शुक्रवार, १७ दिसंबर २०१०

Thursday, December 16, 2010

तरंगित अनंत की ताल


अब मौसम आवारा
लौट रहा दोबारा
घूंघट हटा कर
बह निकली धारा


फिर छूट रहा किनारा
समर्पण लगे है प्यारा
सुनसान वादियों में भी
गुनगुनाये बोध तुम्हारा


ढलान पर फिसलन से बचाए
चिर मुक्ति गीत कौन गाये 
ये किसकी पकड़ है
जो हर बंधन से छुडाये


समेट कर अनाम उछाल
साध कर अपनी चाल
लो मुखरित कृपा नृत्य
तरंगित अनंत की ताल


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
गुरुवार, १६ दिसंबर २०१०



Wednesday, December 15, 2010

साक्षी हो तुम

 
तुम्हारे जाने के बाद
यह जो बच रहता है
एक निर्वात सा
इसे भरने
फिर फिर बुलाता हूँ
तुम्हारी पावन स्मृति

जाग्रत करने
शाश्वत प्रेम के स्पंदन
परतों के पीछे छुपे सत्य को छू लेने 
कभी शब्दों के साथ
कभी मौन में
करती है जो यात्रा
मेरी चेतना
 
ना जाने क्यूं
लगता है
साक्षी हो तुम
मेरे इस अभ्यास के

पर यह
जो तुम्हारे साथ होने
और तुमसे परे होने का अंतर है
क्या इसे पूरी तरह पाट सकता है
श्रद्धा और समर्पण का सूक्ष्म सेतु?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
१५ दिसंबर २०१०, बुधवार


Tuesday, December 14, 2010

आनंद मेरा सारथी

 
देकर अमृत का पता
मौन हुआ मुसकाय
मेरा होकर मोहना
मुझ में ही छुप जाय


आनंद मेरा सारथी
मंगल मधुर विहार
पग पग ऐसी मौज है
खिलता जाए प्यार


गीत वही उगता यहाँ
जिसमें प्रेम अपार
सबसे अपनापन सजे
साँसों में वो सार


चल चल ले विश्वास तू
फैला दे उजियार
छक कर पी ले रात-दिन
दिव्य प्रेम रसधार


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, १४ दिसंबर 2010

Monday, December 13, 2010

दिव्य शपथ है

 
अमृत पथ है 
दिव्य शपथ है
शांति प्रदायक
प्रेम का व्रत है


आनंद उत्सव
साथ सतत है
ज्योतिर्मय 
अपना भारत है

शीतल मन
उजियारा गाये
उसका सुमिरन 
नित्य सुहाए 
 
धरती आँगन 
अम्बर छत है
अमृत पथ है
दिव्य शपथ है
 
 
अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका 
१३ दिसंबर 2010

Saturday, December 11, 2010

तुम्हारी कृपा का आश्वासन









स्मृति में
यह जो
सुनहरा वलय है
निरंतर आश्वस्ति उंडेलता,
इसके केंद्र में ही नहीं
परिधि पर भी
तुम्हारी
स्नेहमयी, करूणावर्षक उपस्थिति
जाग्रत है
स्मृति में ही नहीं
चेतना की
संवाद सतह पर भी
घुला हुआ है
तुम्हारी कृपा का आश्वासन

तुम कैसे
इतना भरोसा देकर
उज्जीवित कर देते
मन प्राण सबके

सोच-सोच कर
लीन हो जाता
तुम्हारे बोध में

ओ शाश्वत!
निसंकोच माखन लुटाने
आ पहुँचते हो तुम तो
घर-द्वार तक
पर
हम ही तुम्हारी टोली में
ना मिल कर
खड़े रह जाते
दर्शक दीर्घा में

ये क्या है
जो रोकता है
तुम्हारे प्रवाह संग
एक मेक हो जाने से?

अशोक व्यास
शनिवार, ११ दिसंबर २०१०

Friday, December 10, 2010

चिरमुक्ति द्वार

 
वह सब
जिसे अपना मान कर
इठलाते, इतराते और 
प्रसन्नता में लहलहाते हो
वह सब
जिसको अपना परिचय मान कर
कभी खिल-खिल जाते
कभी कुढ़ते-कसमसाते हो
 
वह सब
यदि किसी एक अनाम क्षण में
छूट जाए अनायास,
क्या तब भी 
रहेगा अपने होने और खुदको 
बनाने वाले पर विश्वास,
 
वह जो सब कुछ देता है 
हम उससे मांगते हैं 
स्थाई रूप से बने रहने का अधिकार 
और अमर हो जाने की 
मांग पर
सदियों से चल रहा है विचार 
 
 
जो अपने किये या ना किये से
बंधे रह जाते
वे नहीं पहुँच पाते उस पार,
कर्मों के बंधन से मुक्त होने की कला
सीख लेते जो
उनके लिए खुल जाता चिरमुक्ति द्वार


अशोक व्यास
शुक्रवार, १० दिसंबर 2010

Wednesday, December 8, 2010

नींव प्यार के किस्सो की मजबूत रहे

जो भी हो
आनंद तुम्हारा अपना है
सच होकर भी
सपना जो है, सपना है
२ 
अनुभूति पथ फूलों के संग कांटे भी 
सुन्दरता है वहां, जहाँ सब अपना है

मन के जंगल में सावन के आने पर
यूँ लगता है, पग-पग पर एक सपना है

आस्तीन में पाल-पाल कर रखे थे
अब कहते हैं, इनसे हमको बचना है

आसां है विध्वंस जगा देना छुप कर
मुश्किल तो ये प्रेम-भाव की रचना है

सोने-जगने के तय वक्त का वक्त नहीं 
युद्ध काल में नित्य-निरंतर जगना है

हुआ बहुत विश्राम बैठ कर आँगन में 
अब होना है सजग, नहीं अब थकना है

बात वही है, रूप बदल कर आयी है
बोध सत्य का बाँध, कमर को कसना है

नींव प्यार के किस्सो की मजबूत रहे 
इसीलिए सीमा पर साहस रखना है



अशोक व्यास 
बुधवार, ८ दिसंबर २०१० 



Tuesday, December 7, 2010

खेल में खेल

 
जैसे खेल के मैदान में
घुस आये कोई बैल
तब
खेल रोक कर
जुट जाते हैं सब
उसे निकालने में
और फिर 
खेल बिगाड़ने वाला ही
बन जाता है एक खेल
कभी कभी
अवांछित विचार
बिन बुलाये मेहमान से 
घुसपैठ करते हैं
मन के 
शांत उपवन में
छिन्न-भिन्न कर
नीरवता,
भर देते हैं
आवेशित कोलाहल
 
ऐसे में
एकजुट होकर
अनिर्वचनीय शांति का साम्राज्य
स्थापित करने
उसकी ओर देखना,
जिसको देखने से
मधुर रस देती है
खेल में खेल की
यह
समझ को उन्नत करती सीढियां 
-
अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
मंगलवार, ७ दिसंबर 2010

Monday, December 6, 2010

गीत कोई परंपरा का

 
दिन लिहाफ ओढ़े
उनींदा सा
सूरज का तेज़ छुपा कर
सुस्ता रहा है
यूँ तो
 
फिर भी
हवा में
गति की पुकार
बढ़ती जा रही है
 
धीरे धीरे हिलती पत्तियों में
गीत कोई परंपरा का
खोल रहा है
दिन के नाम लिखे
पुराने ख़त
 
और मैं
आसमान में
नन्हे- नन्हे बादलों के बीच
खोज रहा हूँ
वो किरण
जिसे लेकर
खुद तक पहुँचने की 
तैय्यारी करनी है
आज मुझे

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
सोमवार, ६ दिसंबर २०१० 

Sunday, December 5, 2010

समझ के इस नए पड़ाव पर



अब
हम वहां तक
आ पहुंचे हैं
जहाँ
कोई भी
किसी को भी
कह सकता है कुछ भी

अब
हमारी अँगुलियों से
जुडी तकनीकी लहर
जगा सकती है
धरती के एक छोर से
दूसरे छोर तक
पहुँच सकने वाले स्पंदन

स्पंदन शब्द रूप लेकर
दे सकते हैं
दस्तक 
क्षण भर में
सात समंदर पार बसे
किसी घर के 
गोपनीय स्थल तक

स्पंदन पहुंचा सकते हैं
किसी अनजान व्यक्ति तक 
वो सब तस्वीरें
जो हम 
अपनों को दिखाने में
भी संकोच करते थे
अभी कुछ दिन पहले 

अब हम
पहले से बेहतर अवस्था में हैं
हमारी हथेली में
सिमटने को
तैयार है
सारा संसार

पर
अपनी हथेली देख पाने
का धैर्य छूट गया है कहीं 
 
समझ के इस नए पड़ाव पर
यह विचार करने का समय
सिमटता जा रहा है
कि किसको क्या कहना है और क्यूं

हम
पहुँच तो सकते हैं
किसी तक भी
पर पहुँचाने के लिए
हमारे पास
अब
जो कुछ है
क्या उसमें
हम हैं ?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ दिसंबर २०१०

Saturday, December 4, 2010

उसकी आहट


 
कुछ नहीं दिख रहा था
सब कुछ दीखते हुए
सारे शोर-गुल के बीच
गुम हो गयी थी
उसकी आह्ट
जाने पहचाने रास्ते पर
खोया खोया
मैं
विश्वास सूत्र के लिए
बोध की अँगुलियों से
टटोल रहा था
मन का आँगन

सहज होकर भी
सहजता से मिलता नहीं वह
कई बार
और इस तरह
सिखा देता है
पूरी तरह एकाग्र होने की कला

पूरी तरह
सजग होकर
धीरे धीरे
अब जब सुन पा रहा हूँ
उसकी आहट
खोली नहीं है
आँख अपनी

मैं भी
उसकी तरह खेल कर
जता रहा हूँ उसे
कि उसके आने का
मुझे कुछ पता नहीं है

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
४ दिसंबर २०१०

Friday, December 3, 2010

शाश्वत मिलन का अद्वितीय उत्सव


 
अब जब
साफ़ दिख रहा है
सूरज की किरणों में
तुम्हारा चेहरा
और
ऊष्मा यह प्रेम की
सोंख रहा है
मेरा रोम- रोम
अधमुंदी आँखों से
देख कर 
पुष्टि करना चाहता हूँ
यह जो 
महसूस कर रहा हूँ
तुम्हारा होना
अपने आस पास
कहीं तुम भी
देख तो रहे होंगे मुझे
और
तुम्हारी दृष्टि से
पोषित है
यह जो उल्लास सा
मन में
इसे लेकर
नृत्य करने की यह स्निग्ध उमंग, 

लो
सहसा
निश्चल मौन में
सज गया है
शाश्वत मिलन का
अद्वितीय उत्सव

अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
३ दिसंबर २०१०

Thursday, December 2, 2010

विराट गगन को छू लेने

इस समय
जब बैठे हो ध्यान के लिए
मन दौड़ कर
कई दिशाओं से
सन्दर्भों के नए-पुराने कंकर बटोर कर
उलझा देना चाहता है
तुम्हें किसी पछतावे या किसी शिकायत के खेल में

इस समय
ध्यान के लिए बैठ कर
जब देख रहे हो मन की हलचल
और
शांत कक्ष भी बन गया है
जैसे कोलाहल भरे बाज़ार सा
ऐसे में
उठ कर चले ना जाना
करना प्रतीक्षा
साँसों पर ही नहीं
शरीर की सूक्ष्म हरकत पर
एक उपराम दृष्टि डाल कर
धीरे धीरे
धीमी होती लहरों में
तरंगित होगा
एक गहरी आश्वस्ति का वास
इस क्षण की विश्रांति में
खुल जाएगा
वह सुख
जो दुर्लभ है
और तब
अपने मन के पंखों में
विराट गगन को छू लेने की
अकुलाहट का आगमन
प्रफुल्लित कर देगा तुम्हें

यह उल्लास लेकर
लुटा सकते हो
अपार प्यार
पग पग पर

ये विश्वास लेकर
ऐसे अपना सकते हो
नए दिन को
कि जैसे तुम्हारी गति से
हर पग पर
हर संपर्क में
प्रकट होता जाए 
सार पावन तीर्थ का



अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
२ दिसंबर २०१०, गुरुवार

Wednesday, December 1, 2010

लुटेरा परिपूर्णता का


 
 
इतने दिनों के बाद
अब जब
जहाँ भी हूँ
पूरा हूँ अपने आप में
मिल कर औरों के साथ
हर क्रिया से
आरती करता हूँ तुम्हारी

तुम
 ना केवल सम्पूर्ण हो
वरन  निश्छल उदारता से लुटाते भी हो 
अपनी पूर्णता, 
और तुम्हारी कृपा से 
अब मैं भी 
बनने लगा हूँ 
लुटेरा परिपूर्णता का 


अशोक व्यास 
न्यूयार्क, अमेरिका
१ दिसम्बर २०१०

आनंदित निर्झर

छम छम बरसे प्रेमामृत सा खिला करूण अलोक अपरिमित मौन मधुर झीना झीना सा सरस सूक्ष्म  आनंदित निर्झर तन्मय बेसुध  लीन....  ...