Sunday, December 5, 2010

समझ के इस नए पड़ाव पर



अब
हम वहां तक
आ पहुंचे हैं
जहाँ
कोई भी
किसी को भी
कह सकता है कुछ भी

अब
हमारी अँगुलियों से
जुडी तकनीकी लहर
जगा सकती है
धरती के एक छोर से
दूसरे छोर तक
पहुँच सकने वाले स्पंदन

स्पंदन शब्द रूप लेकर
दे सकते हैं
दस्तक 
क्षण भर में
सात समंदर पार बसे
किसी घर के 
गोपनीय स्थल तक

स्पंदन पहुंचा सकते हैं
किसी अनजान व्यक्ति तक 
वो सब तस्वीरें
जो हम 
अपनों को दिखाने में
भी संकोच करते थे
अभी कुछ दिन पहले 

अब हम
पहले से बेहतर अवस्था में हैं
हमारी हथेली में
सिमटने को
तैयार है
सारा संसार

पर
अपनी हथेली देख पाने
का धैर्य छूट गया है कहीं 
 
समझ के इस नए पड़ाव पर
यह विचार करने का समय
सिमटता जा रहा है
कि किसको क्या कहना है और क्यूं

हम
पहुँच तो सकते हैं
किसी तक भी
पर पहुँचाने के लिए
हमारे पास
अब
जो कुछ है
क्या उसमें
हम हैं ?


अशोक व्यास
न्यूयार्क, अमेरिका
५ दिसंबर २०१०

1 comment:

प्रवीण पाण्डेय said...

यही खोखलापन अब संभवतः पीड़ादायक हो रहा है।

वहाँ जो मौन है सुंदर

वह जो लिखता लिखाता है कहाँ से हमारे भीतर आता है कभी अपना चेहरा बनाता कभी अपना चेहरा छुपाता है वह जो है शक्ति प्रदाता  ...